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Friday, May 27, 2016

अनुभव । (लघु कथा । )

अनुभव । (लघु कथा । )
"बेटे, तुम जो काम करने जा रहे हो, वह सर्वाधिक गैर कानूनी है और तुम्हें मुश्किल में डाल सकता है..!" 

" पापा, आप की राय मैंने मांगी है क्या? आप तो रावण से भी बदतर है । आप बस रहने ही दे, आप ने ज़िंदगी भर ऐसे ही गैर कानूनी काम कर के हम सब को कहीं का नहीं छोड़ा ।" 


"ठीक है बेटे, पर ये मत भूलना की रावण के अंतिम समय में, उसने  अपने बुरे अनुभव से जो राजनीतिक ज्ञान अर्जित किया था, वह सीखने के लिए प्रभु श्रीराम ने, अपने भाई लक्ष्मण जी को भेज कर बहुत बड़ा संदेश सारे जगत को दिया था..!" 


" सॉरी पापा...!" 


मार्कण्ड दवे । दिनांकः २६ मई २०१६.


Friday, October 24, 2014

Happy new year.

Nights are Dark but Days are Light, Wish your Life will always be Bright. Wishing You a Happy New Year Saal Mubarak 

MARKAND DAVE.



Wednesday, October 15, 2014

आराम । (गज़लनुमा गीत)

आराम ।  
(गज़लनुमा गीत)


 चल ज़िंदगी,तुझ को नया इक नाम  दें ।
  इस    रूह  को   अब   जरा   आराम  दें ।

१.  
रितुओं  की   तरह,   आते  -  जाते   रहे..!
 उन    ज़ख़मों  को,   अहम     इनाम  दें ।
चल ज़िंदगी,तुझ को नया इक नाम  दें ।

२.  
तुझ  से  बिछड़ना ? ग़म  तो  है,  मगर..!
चंद    पल   हमें,   तनहा,  गुमनाम  दें ।
चल ज़िंदगी,तुझ को नया इक नाम  दें ।
 
३.  
इस  भीड़ में, मिले न कभी, हम से हम..!
ऐसे    रिश्ते  को   सरपट   अन्जाम  दें ।
चल ज़िंदगी,तुझ को नया इक नाम  दें ।
      
सरपट = तेज़,
 
४.  
रुकती  ये   धड़कन,  थमती  ये   सांसें..!
इस    जश्‍न   को,   अनवर   कलाम  दें ।
  चल ज़िंदगी,  तुझ को नया इक नाम  दें ।

     अनवर = श्रेष्ठ, कलाम = जुमला,

     मार्कण्ड दवे । 
दिनांक-१५-१०-२०१४.



Tuesday, September 30, 2014

GHAGHARA-CHANIYA-CHOLI NEW FASHIONS.

GHAGHARA-CHANIYA-CHOLI NEW FASHIONS. 
PL. BLESS HER. THANKS A LOT.
MARKAND DAVE.

 https://www.youtube.com/watch?v=nIQnmJ6GFCw&feature=youtu.be



Mail: mikdesigner20@gmail.com




Thursday, September 18, 2014

ख़्वाबों की बातें । (गीत)

ख़्वाबों की  बातें । (गीत)

ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!
फिर  शब-ए- तन्हाई  में, रोया  करते  हैं  वो..!
 
शब-ए-तन्हाई= रात का अकेलापन;
१.
ज़िंदगी में  कई  हादसे,  आप ने  झेले मगर..!
टूटे ख़्वाबों का  शिकवा  किया  करते  हैं  वो..!
ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!
 
शिकवा=शिकायत,
२.
बिखरा सा  वो   ख़्वाब  और  अँधेरी  वो  रात..!
हाँ, मातम अब उनका, मनाया  करते  हैं  वो..!
ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!
३.
ख़्वाबों की  तसदीक़, हम  करें  भी  तो  कैसे..!
शब  होते  हमें, रुकसत  किया  करते  हैं  वो..!
ख़्वाबों की बातें, अकसर किया करते  हैं  वो..!
 
तसदीक़ = सच्चाई की परीक्षा; शब=रात,
४.
इस  ग़म में, हम भी जागे  हैं   कई  रात,  पर..!
अब  हमें, दूर से   सलाम  किया  करते  हैं  वो..!
ख़्वाबों की  बातें, अकसर किया  करते  हैं  वो..!

मार्कण्ड दवे । दिनांक-१७-०९-२०१४.



Saturday, May 24, 2014

मन । (गीत)

मन । (गीत)
  
मेरा मन किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
किसी   बात   पर,  वफ़ा   कायम  नहीं ?
 

१.
 

मन के  द्वार,  हर  दिन  है  जश्न  मगर..!
उसके   तो    क...भी    ऐसे , करम  नहीं..!
मेरा  मन  किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
 

२.
 

निपटता   है   मन  और  थकता  हूँ  मैं..!
बस,  आगे   और  इक  भी  कदम  नहीं..!
मेरा  मन  किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
 

निपटना = तय करना;
 

३.
 

वश  में    होता   है    मन   कहा   मगर..!
इस   बात  में   कभी,   कोई   दम  नहीं..!
मेरा  मन किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
 

४.
 

वफ़ा  की    चाह,  रब  को  भी  है   मगर..!
चंट  ने   कहा,  ऐसा  कोई   नियम  नहीं..!
मेरा  मन  किसी, गणिका से  कम  नहीं..!
 

चंट = धूर्त-कपटी मन;
 

मार्कण्ड दवे । दिनांकः २४-०५-२०१४.


Tuesday, May 13, 2014

Short story-11. `बला ।`



 Short story-11. `बला ।`

करीब साठ साल की आयु के सेठ प्रताप राय के यहाँ, उनकी, करीब तेईस साल की, दूसरी पत्नी `सतवंती`ने सेठ जी को नन्हा वारिस दिया था । इसीलिए आज सुबह से, धार्मिक हवन आयोजन के चलते कोठी में काफी चहलपहल थी ।
 
पर..,ये क्या..! युवा पंडित `रतिराज` हवन में शुद्ध घी की आहुति दे रहे थे कि अचानक, एक छिपकली का बच्चा, ऊपर छत से, हवन-कुण्ड में आ गिरा..! पूजा में बैठी सेठानी `सतवंती` और 'रतिराज', दोनों ने  यह दृश्य देखा । हालाँकि,कोई दूसरा इसे देख ले उस से पहले ही, युवा पंडित,'रतिराज` ने  ज़ोर-ज़ोर से तुरंत, "॥ ॐ बला टली स्वाहा ॥' मंत्र जाप करते हुए हवन-कुण्ड  में शुद्ध घी का पुरा पात्र  उड़ेल दिया जिस से, छिपकली का बच्चा पलभर में भस्म हो गया...!
 
धार्मिक कर्म संपन्न होने के पश्चात, `सतवंती`ने अपने कर कमलों से, युवा पंडित 'रतिराज' को दान-दक्षिणा देते हुए धीमे स्वर में कहा," सुनिए, आप के लिए तीन लिफाफे है..! पहला-आप ने, मेरी सारी बला का तोड़ निकाला, दूसरा-निर्विघ्न हवन कर्म संपन्न कराया और तीसरा- इस घर में वारिस के लिए जो आशीर्वाद दिया, इसके बदले इस लिफाफे में  आप की दक्षिणा के मैंने एक लाख रुपये ज्यादा रखें हैं..! 

और हाँ आज के बाद, हम कभी आमने-सामने नहीं होंगे । 
समझना, आप के जीवन से भी  `सतवंती` नाम की एक `बला` टल गई..!"
मार्कण्ड दवे ।
दिनांकः १३-०५-२०१४.



Saturday, May 10, 2014

Short story-10. प्याऊ ।


 Short story-10. प्याऊ ।

"अय बुढ़िया..! चुनाव सर पर है,आज प्रधान मंत्री जी आने वाले है, उनकी सुरक्षा का जिम्मा हम पर है, चल उठा तेरा प्याऊ का सामान और भाग यहाँ से..!" गाँव की कच्ची सड़क के किनारे स्थित पेड़ के नीचे, आते-जाते राहदारी को शीतल जल पिलाने वाली बूढ़ी मैया पर, दरोगा साहब ने रोब दिखाया और डंडे से प्याऊ की सारी मटकी फोड़ कर, ज़ोर-ज़ोर से गुर्राने लगे..!

बूढ़ी मैया बिना कुछ बोले, प्याऊ का बाकी सामान ले कर सामने वाले झोंपड़े में चली गई । थोड़ी ही देर में, प्रधान मंत्री जी का काफ़िला आया और वही पेड़ के नीचे रुक गया..! 

प्रधान मंत्री जी ने दरोगा जी से पूछा, " यहाँ एक बूढ़ी मैया का प्याऊ था ना, कहाँ  है?"
 
यह प्रश्न सुन कर दरोगा हकलाने लगा । इतने में सामने से शीतल जल की एक छोटी मटकी और  प्याला ले कर बूढ़ी मैया आती दिखाई दी । प्रधान मंत्री जी फौरन उसकी तरफ दौड़े और उन्होंने ने मैया का चरणस्पर्श किया," कैसी हो मैया ?"
 
निर्दोष भाव से हँस कर बूढ़ी मैया बोली,

" बेटा, इतना बड़ा आदमी हो गया, फिर भी तेरे बचपन के दिन, तुझे अब भी याद है? "
मार्कण्ड दवे ।
 
दिनांकः ०९-०५-२०१४.


Saturday, April 26, 2014

Short Story-7. `पाप-पुण्य ।`


Short Story-7.  `पाप-पुण्य ।`

"मैं  किसी  पाप-पुण्य  में  नहीं  मानता..! Please forgive me and now get lost." कहते हुए मनचले देवांग ने, गर्लफ्रेन्ड मनीषा से पीछा छुड़ा लिया ।

अत्यंत दुःखी मन और 'भारी पैर' के साथ, कॉलेज की बॉय्स हॉस्टल की सीढ़ियां उतर कर, मनीषा  `भारी पैर, हल्का करने`, हॉस्टल के सामने स्थित अस्पताल की सीढ़ियां चढ़ गई..!

 छह माह पश्चात्, कॉलेज की बॉय्स हॉस्टेल के उसी कमरे में, नयी गर्लफ्रेन्ड पायल के सामने देवांग, वही घीसा-पीटा डायलोग, बोल रहा था, "मैं  किसी  पाप-पुण्य  में  नहीं  मानता..! Please forgive me and..!"

 " एक मिनट...!" अचानक ज़ोर से चीखती हुई, मनीषा कमरे में दाखिल हुई," देवांग, आज के बाद, तुम ऐसा पाप दोहरा भी नहीं सकोगे ? जिस पायल को तुम आज छोड़ रहे  हो, वह मेरी फ्रेन्ड  है  और..अ..अ..अ..!" मनीषा ने एक लंबी सांस भरी और आक्रोशित मन से फिर चिल्लाई,

" तेरे  जैसे  किसी  मनचले की  वजह से  पिछले  एक  साल से, 
वह HIV+  की मरीज़ है । तेरे साथ, मैंने  ही उसे  प्लांट किया था,
अब  हिसाब  बराबर, Now you get lost..!  पायल, चल  यहाँ से...!"

मनीषा के चीखने की आवाज़ सुन कर इकट्ठा हुए, बॉय्स हॉस्टल के सारे लड़के अवाक्  थे और शायद हॉस्टल की (पुण्यशाली?) सीढ़ीयां भी....!

मार्कण्ड दवे । दिनांकः २६-०४-२०१४.




Thursday, April 24, 2014

वतन परस्ती । (गीत ।)


वतन परस्ती । (गीत ।)


फिरकापरस्त,  सिखाते   हमें   वतनपरस्ती..!
क्या  ये  लोकतंत्र  है,  या   कोई  जबरदस्ती?

फिरकापरस्त = क़ौमवादी; वतनपरस्ती = देशभक्ति ।

अन्तरा-१.

पेट नोच कर, प्यास छीन कर, सांस लूट कर..!
साँप - नेवले ने कर ली है  क्या, अमन-दोस्ती?
फिरकापरस्त,    सिखाते   हमें    वतनपरस्ती..!

अन्तरा-२.

न  मरते,  ना  मारते  हमें, सियासत वाले..!
मानो, वहशी  बिल्ले  करते,  मूषक मस्ती?
फिरकापरस्त,  सिखाते हमें  वतनपरस्ती..!

वहशी = जंगली; मूषक= चूहा । 

अन्तरा-३.

जाग ज़रा, `मत`कर ऐसा, दिखा उनको अब..!
पूरब-पच्छिम, उत्तर-दकन, ना  लचर बस्ती..!
फिरकापरस्त,  सिखाते   हमें   वतनपरस्ती..!

दकन=दक्षिण; लचर बस्ती = कमज़ोर जनता ।

अन्तरा-४.

लोकतंत्र   में,  वोट-मंत्र  ताक़त  न  सस्ती ।
चल,  मिटा   देते   हैं,  ऐसे-वैसों की  हस्ती..!
फिरकापरस्त,  सिखाते  हमें  वतनपरस्ती..!

मार्कण्ड दवे । दिनांकः २४-०४-२०१४.



Monday, April 21, 2014

Micro Short story - 5. `विष पान ।`


Micro Short story - 5. `विष पान ।`

बैंक के वोशरूम में, कैशियर शिव अत्यंत दुःखी मन के साथ, हाथ में ज़हर की शीशी लिए  बैठा  था कि अचानक, वॉशरूम का दरवाजा किसी ने खटखटाया, " शिव, मैनेजर साहब ने फौरन तलब किया है..!"  किसी कठपुतली की भाँति, खुद को घसीटता हुआ, शिव मैनेजर की केबिन तक पहुंचा ।

" शिव, ये मि. शर्मा हैं, दो लाख रुपये का आज हिसाब नहीं मिल रहा है, वह गलती से तुमने इन्हें दे दिया था, अब कोई कानूनी कार्यवाही नहीं होगी..!"

शर्मा जी बोले, "मुझे याद है..! लॉकर से निकाले हुए लाखों के ज़ेवर, जब मैं यहीं भूल गया था, तब आप ने ही तो सारे ज़ेवर सही-सलामत मुझे वापस किए थे..!"

शिव ने आँसू की बूँदो के साथ, मैनेजर साहब के टेबल पर, ज़हर की शीशी और स्यूसाईड नोट भी रख दिया, जिसे पढ़ कर, उपस्थित सभी लोग रो पड़े..!  


हाँ, आँसू  तो थे मगर, खुशी के,  क्योंकि, भोला-भाला शिव विष पान से बाल-बाल बच गया?

मार्कण्ड दवे । दिनांकः २१-०४-२०१४.



Friday, April 18, 2014

Micro short story-6 `अनपढ़-गँवार । `


Micro short story-6 
`अनपढ़-गँवार । `

सुबह-११.०० बजे ।
 
"बेटे, कामवाली बाई के लड़के, छोटू के साथ मत खेलना, देखा नहीं, 
उसके बाप ने शराब पी कर, कामवाली बाई को कितना पीटा है..! 
ये अनपढ़-गँवार लोग है, इन से दोस्ती रखना अच्छी बात नहीं है ।" 
सिर्फ छह साल का मंथन, कुछ समझा-कुछ ना समझा पर ,
उसने मम्मी के सामने अपना सिर हिला  दिया..!
 
रात - ११.०० बजे ।
 
" आज फिर से, आप शराब पी कर आए, 
मंथन जाग जाएगा तो क्या सोचेगा ? क्या..! 
हाँ, जाओ, आज फिर से मैंने, आप की गर्लफ्रेंड को, 
फोन पर फटकार लगाई है, क्या कर लोगे ? 
ओ..ह, नो..नो.. यु आर हर्टींग मी..
प्लिझ, मत मारो मुझे..सहन नहीं  होता..! 
ओह..अ..अ..अ..गो..ड़..!"
 
दूसरे दिन-सुबह- ९.०० बजे ।
 
" कल रात पापा ने शराब पी कर आप को बहुत पीटा था ना मम्मी? 
अब तो हम भी अनपढ़-गँवार हो गए, 
क्या अब मैं छोटू से साथ खेल सकता हूँ ?"
 

मार्कण्ड दवे । दिनांकः १८-०४-२०१४.





Monday, April 14, 2014

आँसू । (गीत)



आँसू । (गीत)


जा, समंदर को,  लहूलुहान कर  दे ।
आँसूओं से  गहरी, पहचान कर  ले ।

( समंदर = दुनिया )

 
अन्तरा-१.

 
तन्हा है  लम्हा, गुमशुदा  है  दिल..!
चप्पे - चप्पे,  इक  दरबान  धर  दे ।
जा, समंदर को  लहूलुहान कर  दे ।

गुमशुदा = लापता ।

 
अन्तरा.-२

 
रुके,  ना   थमे,  यही  तो  वक्त  है..!
दम है  तो, उस पर निशान कर ले ।
जा, समंदर को लहूलुहान कर  दे ।


अन्तरा-३.

हँसी, न  खुशी, ग़मज़दा है  सांसें..!
बच्चों के  नाम,  मुस्कान  कर  दे ।
जा, समंदर को लहूलुहान कर  दे ।

ग़मज़दा = दुःखी ।

अन्तरा-४.

न  तेरा,  न  मेरा,  समंदर झमेला..!
खुद को जहाँ का, मेहमान  कर  ले ।
जा, समंदर को  लहूलुहान  कर  दे ।

झमेला = भीड़-भाड़ ।

मार्कण्ड दवे । दिनांकः १४-०४-२०१४.




Friday, April 11, 2014

Micro short story -4. `शायद..!`


Micro short story -4. `शायद..!`

"ये क्या है नंदिनी? आज, पहली बार काम में इतनी गलतियां..! क्या बात है, बहुत उदास लग रही हो..!"  
मैनेजर साहब ने नंदिनी से  आख़िर पूछ ही लिया ।

" सर, मेरे तीन साल के बेटे को किडनी में स्टोन का प्रॉब्लम हुआ है, उसके ऑपरेशन के लिए दो लाख रुपये चाहिए मगर, मेरी हालत..!" कहते-कहते नंदिनी की सुंदर आंखे भर आयीं ।

करीब दस मिनट के बाद, पहली बार, स्मार्ट,युवा और हेन्डसम, बोस के सामने नंदिनी खड़ी थी ।

बोस ने, नंदिनी को सर से पाँव तक घूरते हुए, कहा, " समय नहीं है, सीधा पाइन्ट पर..! लोन मिल जाएगा, 
क्या तुम समझौते (Compomise) के लिए तैयार हो?"

नंदिनी ने केबिन का दरवाजा पुरा खोला, बोस के गाल पर, एक करारा चाँटा मारा और पीछे मुड़ कर देखे बिना ही, ऑफिस की लिफ्ट की ओर आगे बढ़ गई । 

केबिन के बाहर भौंचक्का सा खड़ा  हुआ पुरा स्टाफ, सबकुछ समझ रहा था, अधिकतर महिला कर्मचारी..!

शायद, नंदिनी भी इतनी नासमझ नहीं थी..!

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ११-०४-२०१४.




Tuesday, April 8, 2014

Micro short stories -03. Intellectual Prostitute - प्रबुद्ध गणिका ।


Micro short stories -03. 

Intellectual Prostitute 

- प्रबुद्ध गणिका ।

चुनाव की सरगर्मी बड़ी तेज़ हो गई थी । तथाकथित सेक्युलर टीवी न्यूज़ चैनल के एन्कर्स - रिपोर्टर्स,जनता का मुड़ भाँप ने के लिए, यहाँ से वहाँ भाग दौड़ कर रहे थे ऐसे में, `कब-तक टीवी चैनल का रिपॉर्टर, `लपक शर्मा` एक बदनाम मोहल्ले से गुजरा ।

" इस वक्त मैं, अनपढ़ और अपना देह व्यवसाय कर ने वाली महिलाओं के मोहल्ले से लाईव रिपोर्टिंग कर रहा हूँ । आइए, यहाँ की लोकल महिलाओं से, ये किसे वोट देंगी उसके बारे में जान ने की कोशिश करें..!"

चैनल के स्टूडियो में बैठे एंकर, `लसून क्रांतिकारी` ने,  रिपोर्टर `लपक शर्मा` के कान में कहा," ल..प..क, उन से ये सवाल पूछिए, क्या  ये महिलाएं हमारे न्यूज़ हर रोज़ देखती हैं? कैसा लगा हमारा चुनावी विश्लेषण कवरेज?"

लपक शर्मा, (कुछ सेक्स वर्कर्स से ।), " सब से पहले ये बताइए, क्या आप हमारा न्यूज़ चैनल `कब-तक - चुनाव ` रोज़ देखती हैं? कैसा लगा हमारा प्रोग्राम?"

अपने आप को अनपढ़ और अपना देह व्यवसाय करने वाली बताने पर अत्यंत चिढ़ीं हुई, पढ़ीलिखी एक सेक्स वर्कर ने, लपक शर्मा को 
बौद्धिक तमाचा मारते हुए कहा,

" ये सारी महिलाएँ, आप जैसी, `प्रबुद्ध गणिकाओं -(Intellectual Prostitutes)` के प्रोग्राम कभी नहीं देखतीं..!"

मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०८-०४-२०१४.



Monday, April 7, 2014

आते-जाते रहेंगे । (गीत)


आते-जाते रहेंगे । (गीत)

ग़मों का  क्या है, वो तो  आते-जाते  रहेंगे..!
और जालिम ? बस, यूँ ही मुस्कुराते  रहेंगे ।

अन्तरा-१.

वास्ता हो जिन्हें वो, जानते हैं, मज़ा उसका..!
हैं   ग़मखोर, गज़ब  हम भी आज़माते रहेंगे..!
ग़मों का   क्या  है, वो तो  आते - जाते रहेंगे..!
 
ग़मखोर = सहनशील ।

अन्तरा-२.

गर है , तबाह करना, मकसद उनका, यारों..!
कमज़ोर   नहीं   हम   भी, दर्द   सहते  रहेंगे ।
ग़मों का  क्या  है, वो तो  आते - जाते  रहेंगे..!

अन्तरा-३.

दमदार ग़म परखना, पाला है शौक हमने..!
ताउम्र      क़र्ज़     उनका,     चुकाते  रहेंगे ।
ग़मों का  क्या है, वो तो  आते-जाते  रहेंगे..!

अन्तरा-४.

थामा है, कब से  हमने, प्याला  ज़हर  का..!
फरहत के,  गीत अक्सर, गुनगुनाते रहेंगे ।
ग़मों का  क्या है, वो तो  आते-जाते  रहेंगे..!

फरहत = खुशी.


मार्कंड दवे । दिनांकः ०७-/०४/२०१४.



 

Friday, April 4, 2014

अय बुड्ढ़े..!


Micro Short Stories -1
 
(अय बुड्ढ़े..!)

" अय बुड्ढ़े, एक बार कह दिया ना,..! 
साहब, मीटिंग में बहुत बिज़ी हैं, सुनाई नहीं देता क्या? 
चल भाग यहाँ से, कहाँ-कहाँ से आ जाते है भिखमंगे, चल हट..!

लाचार बुड्ढा आदमी, 
ऑफिस प्यून के  ज़ोर के धक्के से, ऑफिस के दरवाजे से बाहर जा गिरा ।

सीसीटीवी कैमरे पर सारा नज़ारा देख रहे साहब ने,
टी-२० वर्ल्ड कप की रोमांचक मैच की आवाज  कम करते हुए,
चिढ़ कर वृद्धाश्रम के संचालक को फोन पर धमकाया,

" इतने सारे रुपये की मदद के बावजूद, 
पिताजी को क्यों ऑफिस आने देते हो?
 
वृद्धाश्रम बंद करवा दूँ क्या?"

मार्कंड दवे । दिनांकः ४/४/२०१४.








Monday, March 31, 2014

सियासत के रंग ।(गीत)


सियासत के रंग ।(गीत)

ये  सियासत के रंग  भी  बड़े अजीब  होते  हैं..!
अवाम  से ज्यादा  जहाँ, नेता  गरीब  होते  हैं ।

अन्तरा-१.

यहाँ - वहाँ, जहाँ - तहाँ, मिले जाने कहाँ - कहाँ..!
कलेजा  कतरने वालों के  हज़ार  मुरीद  होते  हैं..!
ये   सियासत के   रंग  भी  बड़े   अजीब  होते  हैं..!

मुरीद= अनुयायी


अन्तरा-२.

पेट में  दहकते  शोले, खेत में   चहकते  निवाले..!
मुँह  तक  आते-आते, सिर्फ वादे  करीब  होते  है ?
ये  सियासत के  रंग  भी   बड़े   अजीब  होते  हैं..!

अन्तरा-३.

सियासी  कूड़ेदान  में   तलाशे   सुकून   मगर..!
शान से  पाले अरमान, कायम  रकीब  होते  हैं..!
ये  सियासत के  रंग  भी  बड़े  अजीब  होते  हैं..!

कूड़ादान= डस्टबीन; रक़ीब = शत्रु, दुश्मन, वैरी,

अन्तरा-४.

जूझते  रहो, तुम  घुटते   रहो, बस  लूटते  रहो..!
दुनिया में सब के, अपने-अपने नसीब  होते  हैं ।
ये  सियासत के   रंग  भी   बड़े  अजीब  होते  हैं..!

घुटन=बेचैनी

अन्तरा-५.

`नेताजी, तुम आगे  बढ़ो, हम तुम्हारे  साथ  है..!`
चीखने  वाले    सारे,   हराम - हबीब   होते   हैं ।
ये  सियासत के  रंग  भी  बड़े  अजीब  होते   हैं..!

हराम=छल-कपट,बदनीयत; हबीब = दोस्त,मित्र ।

मार्कण्ड दवे । दिनांक - ३१-०३-२०१४.




Wednesday, March 19, 2014

पेट की सलवटें । (गीत)

पेट की सलवटें । (गीत)

चल, पेट की  सलवटें, मिटाने की  कोशिश करें ।
हाँ,  इक  नए  नेता  की,  फिर  आज़माइश करें ।

अन्तरा-१.

गरीबी  का  बुखार है, फकीरी  का खुमार भी..!
चल, कड़ी  भूख  की  फिर  से  फरमाइश  करें ।
हाँ,  इक  नए  नेता  की, फिर आज़माइश  करें ।  

अन्तरा-२.

सुना   है,  ज़हर  की  खेती  होती  है  देश  में..!
चल, भीख में राशन की  फिर  गुजारिश  करें ।
हाँ,  इक  नए  नेता  की, फिर आज़माइश करें ।  

अन्तरा-३.

बच्चों  की  कसम  है  बाबू, अब वह रोते  नहीं..!
चंद  सांसों के लिए, क्यों न फिर सिफारिश करें ?
हाँ,  इक  नए  नेता  की, फिर आज़माइश  करें ।  
अन्तरा-३.

या रब, देख  रहा  है  ना  सब? कह  दे  उन्हें...!
इक बार फिर, हसीं वादों की  तेज बारिश करें ।
हाँ,  इक  नए  नेता  की, फिर आज़माइश  करें ।

मार्कण्ड दवे । दिनांक - १९-०३-२०१४.



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