Monday, May 2, 2011

कफ़न

 पसीने से भिगे बदन ।
(courtesy-Google images)



ये पसीने से भिगे हुए हैं बदन ।
पेट भरने को छोड़ा है अपना वतन ।
1.
शहर में ये उठता धुआँ सा क्यूँ है?
किसी मजबूर दिल की है ये जलन।
पेट भरने को छोड़ा है अपना वतन।
2.
ठेलोँ के नीचे बँधी ये चादर क्यूँ है?
पलते है इन में देखो ग़रीबों के रतन ।
पेट भरने को छोड़ा है अपना वतन ।
3.
ये रोते-बिलखते मासूम क्यूँ है?
बेबसी ने बिकाया, माँ का ये तन ।
पेट भरने को छोड़ा है अपना वतन ।
4.
फुटपाथ भी ये परेशान क्यूँ हैं?
ओढ़ कर कोई सोया हुआ है कफ़न ।
पेट भरने को छोड़ा था उसने वतन ।
मार्कण्ड दवे। दिनांकः२६/०२/२०११.

8 comments:

  1. सच्चाई बताती अच्छी रचना

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  2. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 03- 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  3. भीगे
    पलते हैं इन में
    ओढ़कर

    पेट की आग अपने वतन से दूर कर देती है ...इन मेहनतकशों की पीड़ा की मार्मिक अभिव्यक्ति !

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  4. बेहद मार्मिक चित्रण किया है।

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  5. फुटपाथ भी ये परेशान क्यूँ हैं?
    औढकर कोई सोया हुआ है कफ़न।....

    बहुत सटीक और मार्मिक चित्रण..आभार

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  6. बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है आपने । व्यथा की सहज अभिव्यक्ति।

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  7. बहुत मर्मस्पर्शी रचना । शुभकामनाएँ ।

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  8. संवेदना से भरी रचना।

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