Friday, October 21, 2011

भ्रष्ट-व्यंग-दोहे ।




भ्रष्ट-व्यंग-दोहे ।


प्यारे दोस्तों,

आज के हालात के अनुरूप, यथार्थ,  भ्रष्टाचारी-व्यंगात्मक  दोहे..!! 

(१)


* आदरणीय श्रीअण्णाजीके दल में घूसे हुए,  तकसाधुओं को समर्पित...!!


अण्णा  अण्णा  सब  जपे, देखत है सब ताल,


मौका जिसको जब मिले, एंठत है सब माल ।


(२)


* जेल के बजाय आज भी, जो  नेता महलमें एश कर रहे हैं, उनको समर्पित..!!


भ्रष्टाचारी  मत  कहो, लेता  कभी - कभार,


बकते  हैं  जो  बकबकें, भरता उदर अपार ।


(३) 


* भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन कर रहे, कार्यकर्ता पर, हिंसक हमला करनेवालों को समर्पित..!!


बजरंग  तो  बदल  गए, कलयुग  गयो  समाय,


लंकादहन  को  भूल  ये, अवध को  ही जलाय ।


(४)


*  पार्टी फंड एंठनेवाले,  राष्ट्रिय पक्षों के शिर्षस्थ नेताओं को समर्पित..!!


उजला - काला  सब  लिया, दरद  न  मन में जान,


परम -  करम  तो  नगद  है,  धरम  घूस  ही मान । 


(५)


*  ग़रीब जनता का लहु पीनेवाले, सभी राजनेताओं को समर्पित..!!


धन - दौलत की  लत  लगी, पूजत  है  दिन रात,


नेता  बेचारा  क्या  करें, बिन  मांगे  मिल जात ।


(६)


* हरदम  दंभी  प्रामाणिकता का राग  रटनेवाले, सभी लोगों को समर्पित..!!


धन को काला मान के, जनता  बहुत पीड़ाय,


सुख तो नेता-घर  बसे, बैठा अलख जगाय ।


(७)


*  जेल में बैठ कर, बिना ड़रे, मौज उड़ा रहे, सभी भ्रष्टाचारीओं को समर्पित..!!


लक्ष्मी  की  नाराजगी, घर खाली कर जाय,


भ्रष्टाचारी  ना  डरे, सब कुछ अपहर जाय ।


(८)

चुनाव के वक़्त घर बैठ कर, वोटिंग न करनेवाले, सभी  नागरिको कों समर्पित..!!


टेबल - टेबल  घूम  के, बांटो  तुम  परसाद, 


बच्चें  भूखों जब मरे, मत करना अवसाद । 

(अवसाद = विषाद)


मार्कण्ड  दवे । दिनांक- २१-१०-२०११.

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