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Friday, July 15, 2011

आतंकवादी हाय-कु-कथा?

आतंकवादी हाय-कु-कथा?
सौजन्य-गूगल


आतंकवादी हायकु-कथा?


http://mktvfilms.blogspot.com/2011/07/blog-post_15.html

१.

सुबह पूरे
  
थे पापा; शाम लौटे

हैं  टुकड़ों में..!!

२.

छिपे हो खुद,

कमांडो के पिछे यूँ?

बहुत अच्छे..!!

३.

ऐ  सियासत

क्या चाहिए और भी,

जान के सिवा?

४.

मरी है आज,

इन्सानियत एक  

ही, धमाके में?

५.


दिल का कोना

हुआ  लहूलूहान,
  
रोता भी नहीं..!!

६.

मुंबई-कर,


कभी सोता नही है,

लाश बन के..!!

७.

उठेगी आंधी,

कभी तो ढेर होगा,

आतंकवाद?

हे राम..!!

मार्कण्ड दवे । दिनांक-१५-०७-२०११.

4 comments:

  1. सीधी दिल पे चोट देने वाली पर ऐसा भी नही केह सकते के क्या खुब कही!

    Rajul Shah
    http://www.rajul54.wordpress.com

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  2. आपने लिखा क्या खूब
    दिल में दर्द होने लगा

    आपकी,हाय कु-कथा दिल की व्यथा को
    व्यक्त कर रही है.

    बहुत बहुत आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आपके दर्शन अपेक्षित हैं.

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  3. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! बेहतरीन प्रस्तुती!

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  4. गजब... अद्भुत, गागर में सागर ला दिया है आपने. हायकुओं ने आम मन की व्यथा को भली प्रकार प्रतिबिंबित किया है...

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