मता -ए कूचा - ओ - बाज़ार ।
(courtesy-Google images)
फ़िल्म - दस्तक -
हम हैं मता -ए कूचा - ओ - बाज़ार की तरह ।
फ़िल्मी गज़ल रसास्वाद- १.
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प्रिय दोस्तों,
हिन्दी फ़िल्मो के चाहने वालों में, कोई गज़ल का अनुरागी न हो, ऐसा मानना मुश्किल सा लगता है ।
फ़िल्मों में गज़ल की शुरुआत सर्व प्रथम वाक् फ़िल्म `आलमआरा` से ही हो चुकी थी । `आलमआरा` फ़िल्म में कई गज़ल और गज़लनुमा गीत पेश हुए थे।
हिन्दी फ़िल्मो में, हिन्दी के कई रचना कारों ने, गज़ल के प्रति अपना समर्पण भाव प्रदर्शित किया है । फीरभी हिन्दी कवि यों से ज्यादा उर्दू शायरो का योगदान ज्यादा रहा है । जैसे, क़मर जलालाबादी, स्व.शकील बदायूँनी, स्व. राजा मेंहदी अली ख़ाँ, हसरत जय पुरी, साहिर लुधियानवीँ, मजरुह सुलतान पुरी, कैफ़ी आज़मी. राजेन्द्र क्रिश्न, नक्स लायलपुरी(असली नाम-जसवंतराय), और अनेक नामी-अनामी शायर ने अपना योगदान दिया है ।
वैसे तो, कई फिल्मों में प्राचीन शायर जैसे, गाल़िब, ज़ौक़, दाग़, जिगर, बहज़ाद, शमीम और अन्य कई शायर की गज़लों को भी उचित स्थान मिला है ।
मनुष्य के स्वभाव की सरलता, सौंदर्य, प्रेम माधुर्य, प्रार्थना, और कभी अमीरी -ग़रीबी , ज़िंदगी की कटू सच्चाई के ज़ख्मों को हूबहू पेश करके, दर्शकों के जख़्मी दिलों पर मरहम लगाने वाली गज़ल सब के दिलों पर राज करने लगी । सुप्रसिद्ध फिल्म निर्माता-निर्देशक, संगीतकार, गायक-गायिका, हर एक ने गज़ल को बड़े प्यार से मानो गले लगा लिया ।
आज, बड़ी विनम्रता के साथ, गज़ल के मर्म को सरल भावार्थ में पेश करने की आपसे, मैं अनुमति चाहता हूँ । आशा है मेरा ये प्रयास आपको अवश्य अच्छा लगेगा ।
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फ़िल्मी गज़ल रसास्वाद- १.
फ़िल्म - दस्तक
" हम हैं मता -ए कूचा - ओ - बाज़ार की तरह ।"
वाह! यह ग़ज़ल इतनी खूबसूरत पहले कभी सुनायी नहीं दी..हर वाद्य बहुत साफ़ सुनायी दे रहा है..क्या आप ने रीमिक्स किया है???बहुत ही अच्छी रिकॉर्डिंग है ..
ReplyDeleteआभार.