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Monday, July 4, 2011

आधुनिक बोधकथाएँ-६. दिलचस्प साक्षात्कार ।


आधुनिक बोधकथाएँ-६.  
दिलचस्प साक्षात्कार ।
सौजन्य-गूगल।



(म्यूज़िक- ढें..टें..ने..ण..!!)

आर.जे.(रॅडियो जॉकी।),"  प्यारे दोस्तों, आज हमारे बीच उपस्थित है, `पुरुष-प्रधान विवाह-विचारधारा` के कट्टर विरोधी, आजीवन कुँवारी, अखिल भारतीय विवाह विरोधी संगठन की एकमात्र ऍक्टिविस्ट बहन सुश्री......!!...........,बहन जी, हमारे, `४२० F.M. रेडियो स्टेशन` पर आपका दिल से स्वागत है ।"

बहन, " धन्यवाद ।"

R.J.-" अच्छा आप पहले ये बताइए कि,आप के `विवाह विरोधी संगठन` में, आज की डेट में, कितने सदस्य है?"

बहन,(ऊँगलियां गिनते हुए..!!),"ट्रेड सिक्रेट, नो कमेन्ट्स..!!"

R.J.-" दूसरा सवाल, आपकी  पति-विरोधी नज़र से, किसी विवाहित नारी के जीवन में,अपने पति की क्या क़ीमत होनी चाहिए?"

बहन," ZERO-शून्य-कुछ भी नहीं..!! सारे पति देव उल्लु जैसे ही बुद्धिहीन होते हैं, इसीलिए तो मैं, हरेक नारी को शादी करने से पहले सौ बार सोचने की सलाह देती हूँ । नारी मुक्ति ज़ि..दा..बा..द..!!"

R.J. (चिढ़ते हुए )-" क्यों..!! आप किस आधार पर,  `उल्लु` का उप-नाम देकर, सारे पुरूष पर  इतना बड़ा इल्ज़ाम लगा रही है?"

बहन," सीधी सी बात है..!! पूरा दिन पत्नी की दुनियाभर की बुराईयाँ करने वाले पति देव को, रात ढलते ही, घने अंधेरे में भी, अपनी पत्नी में,`उल्लु की भाँति`, दुनियाभर के सद्गुण, नज़र आने लगते हैं?"

R.J.-" पर बहन जी, पत्नी पर भी, ऐसे आरोप लगते ही हैं कि,पति बेचारा पूरा दिन मेहनत करके रुपया कमाता है और पत्नी, शॉपिंग के बहाने, शॉपिंग-मोल में जाकर, उसे  फ़िजूल-खर्च कर देती है?"

बहन," फ़िजूल चीज़ो का शॉपिंग करना, सभी पत्नीओं का जन्मसिद्ध अधिकार है, उस पर कोई पाबंदी नहीं लगा सकता..!!"

R.J.-"ठीक है, अगला प्रश्न । विवाह-विरोधी संगठन गठित करने की प्रेरणा,आप को  कहाँ से मिली?"

बहन," मेरे घर में, मेरी माता जी से..!!"

R.J.-" आप की माता जी, शादीशुदा थीं?

बहन,(गुस्सा होकर)" कौन से शास्त्र में लिखा है, एक स्त्री ग़लती करें तो, दूसरी स्त्री को भी, उस ग़लती को दोहराना चाहिए?" 

R.J.-" समझ गया..!! अच्छा बहन, आप के किसी प्रशंसक पुरूष का कॉल है, क्या आप उनके प्रश्न का जवाब देना चाहेंगी? महाशय, ज़रा आपका नाम और प्रश्न बतायेंगे?"

कॉलर पुरूष," मेरा नाम.....है । मैं आपका एक्स प्रेमी हूँ और आज भी आपसे बहुत प्रेम करता हूँ, मुझे पहचाना? मैं,....करोड़पति श्री....., का इकलौता बेटा? आपके साथ कॉलेज में? बहुत साल पहले ? मैंने आपको, एक प्रेम पत्र भेजा था..!! मैंने अभी तक शादी नहीं की..!! क्या  आप मुझ से लीव-इन-रिलेशनशिप बनाएगी?"

बहन," अ...बे, सा..आ..ल्ले..!! इतने साल,  मुझे छोड़ कर, कहाँ ग़ायब हो गया था?  मैं तुमसे, अभी और इसी वक़्त मिलना चाहती हूँ..!! इस वक़्त तुम कहाँ हो?"

कॉलर," डार्लिंग,मैं इस वक़्त, रेडियो प्रोग्राम ख़त्म होने की प्रतीक्षा में, रेडियो स्टेशन के बाहर ही खड़ा  हूँ..!!"

बहन," य..स, य..स, स्टे धेर, आय एम जस्ट कमिंग..!! मैं तुम से अभी, इसी वक़्त, शादी करना चाहती हूँ..!!"

R.J.-(हैरानगी जताते हुए)" पर, बहन जी, अपने आज के इस रोचक साक्षात्कार का क्या होगा? 


और फिर आप के विवाह विरोधी आंदोलन का क्या होगा? 


आप के उकसाने पर, आप के संगठन से जुड़ी हुई, बाकी महिला सदस्यों का भविष्य क्या होगा?"


बहन," नॉ कमेन्ट्स..!! ये ले तेरा माइक..!! मैं तो चली, मेरे डार्लिंग के पास..!! बा..य,बा..य?"

आधुनिक बोध-   अपने किसी निर्णय पर, बहने, सदा अटल रहती है, ऐसा मानने की भूल, किसी पुरूष को हरगिज़ नहीं करनी चाहिए..!!

मार्कण्ड दवे । दिनांक-०४-०७-२०११.

Wednesday, April 20, 2011

परिवार की पत संभाले, वही है पत्नी..!!

परिवार की पत संभाले, वही है पत्नी..!!(इज्जत)
(Courtesy Google images)

प्रिय मित्र,
 
एक बार, एक पति देव से किसी ने सवाल किया,"पति-पत्नी के बीच विवाह - विच्छेद होने की प्रमुख वजह क्या है?"
 
विवाहित जीवन से त्रस्त पति ने कहा,"शादी..!!"
 
हमें तो इनका जवाब शत-प्रतिशत सही लगता है.!!
 
मानव नामक नर-प्राणी,  वयस्क होते ही, अपना जीवन साथी पसंद करने के बारे में, अपनी बुद्धिमत्ता और समझदारी से,कुछ ख्याल को पाल-पोष कर,उसके अनुरूप किसी नारी के साथ विवाह के बंधन में बंध जाता है । 

फिर आजीवन ऐसी गलतफ़हमी में जीता है कि, मेरी पत्नी, मेरे उन ख्याल के अनुरूप, बानी-व्यवहार अपना कर,सहजीवनका सच्चा धर्म निभा रही है..!!
 
पर, सत्य हकीक़त यही होती है कि, विवाह के पश्चात, पति देव के ख्यालात आहिस्ता-आहिस्ता कब बदल कर पत्नी के रंग में रंग जाते हैं,पता ही नहीं चलता..!!
 
वैसे, अगर कोई पति अपने सारे विचार पत्नी के विचारों से एकाकार कर दें, इसमें कोई बुराई नहीं है ..!! पर हाँ, पत्नी के अलावा, परिवार के बाकी सदस्य को, अपने बेटे-भाई के ऐसे भोलेपन पर एतराज़ ज़रूर हो सकता है?
 
हालाँकि, पति देव के मुकाबले, जगत की सभी पत्नीओं की, छठी इंद्रिय (sixth sense) बचपन से ही, जाग्रत होने की वजह से, वह ये बात अच्छी तरह जानती हैं कि, विवाहित जीवन सुखद बनाने के लिए, पति को समझने में ज्यादा समय व्यतित करना चाहिए और  उसे प्यार करने में कम से कम..!!
 
इसी तरह, पति देव भी, अपने नर-प्राणी होने की गुरूताग्रंथी से ग्रसित होकर, शादी के बाद थोड़े ही दिनों में समझ जाता है कि, विवाहित जीवन सुखद बिताने के लिए, पत्नी को प्रेम करने का दिखावा करने में ज्यादा समय देना चाहिए और उसे समझने के लिए कम से कम..!! (जिसे बनाने के बाद, खुद ईश्वर आजतक समझ न पाया हो, उसे कोई पति क्या ख़ाक समझ पाएगा?)
 
इसीलिए,ऐसा कहा जाता है कि, जीवन में दो बार आदमी, औरत को समझ नहीं पता,(१) शादी से पहले (२)शादी के बाद..!!
 
पत्नी को समझने में अपना दिमाग ज्यादा खर्च न करने के कारण ही, विवाहित पुरूष,किसी कुँवारे मर्द के मुकाबले ज्यादा लंबी आयु बिताते है, ये बात और है कि, विवाह करने के बाद, ज्यादातर पति देव (मर्द) लंबी आयु भुगतने के लिए राज़ी नहीं होते..!!
 
हिंदुस्तान में पत्नी की परिभाषा |
 
भारत में हिंदु धर्म के अनुसार, `पत्नी` ऐसी नारी है, जो अपने पति के साथ, अपनी पहचान सहित, घर संसार के सभी विषय,चीज़ में,समान अधिकार रखती हो,जीवन के निर्णय एक दूसरे के साथ मिलकर करती हो,अपने परिवार के सभी सदस्य के आरोग्य,अभ्यास एवं अन्य ज़िम्मेदारी का वहन करती हो । 
 
हमारे देश में करीब, ९० % विवाह,पति-पत्नी के दोनो परिवारों की सहमति से  (Arranged Marriages) किए जाते हैं । जिस में धर्म,जाति,संस्कृति और एक जैसी आर्थिक सक्षमता-समानता को ध्यान में रख कर, ये विवाह संबंध जोड़े जाते हैं।

सन-१९६०-७० के दशक तक तो, भारत के कई प्रांत में,घर के मुखिया की पसंद के आगे, नतमस्तक होकर, हाँ-ना कुछ कहे बिना ही विवाह करने का रिवाज़ अमल में था । हालाँकि, ऐसे रिवाज़ के चलते कई पति-पत्नी आज भी मन ही मन अपना जीवन, किसी बेढंगी बैलगाडी की रफ़्तार से, मजबूर होकर, बेमन से संबंध निभा रहे होंगे..!!
 
मुझे सन-१९५८ का एक,ऐसा ही किस्सा याद आ रहा है, हमारे गुजरात के एक गाँव में, किसी कन्या को देखने के लिए गए हुए,एक युवक और उसके माता पिता को, भोजन का समय होते ही, कन्या के माता-पिता ने, मेहमानों को भोजन ग्रहण करने के लिए प्रेमपूर्वक आग्रह किया, जिसे मेहमान ठुकरा न सके । उधर  कन्या के परिवार को लगा कि, विवाह के लिए सब राज़ी है,तभी तो हमारे घर का भोजन मेहमानोंने ग्रहण किया है..!! अतः विवाह वांच्छूक युवक की झूठी थाली में, उस कन्या को उसकी माता ने भोजन परोसा । मारे शर्म के कन्या ने, अपने होनेवाले पति का झूठा  भोजन ग्रहण किया..!! हिंदु शास्त्र की मान्यता के अनुसार, जो कन्या ऐसे समय किसी युवक का झूठा खा लेती हैं तो, वह दोनों विवाह के लिए राज़ी है ऐसा माना जाता है ।
 
हालाँकि,बाद में पता चला कि, कन्या का वर्ण  श्याम होने के कारण, युवक इस कन्या से विवाह करने को राज़ी न था, पर परिवार के मुखिया के दबाव में आकर, उस युवक को अंत में, उसी कन्या से शादी करनी पड़ी..!!
 
"न हि विवाहान्तरं वरवधूपरीक्षा ।"  
 
अर्थातः- विवाह संपन्न होने के बाद  वर-वधु की जाति पूछना निरर्थक है ।   
 
पत्नी कैसी होनी चाहिए? सर्वगुण संपन्न पत्नी की व्याख्या यह है कि,
 
कार्येषु मंत्री, करणेषु दासी, भोज्येषु माता, शयनेषु रम्भा   ।
धर्मानुकूला क्षमया धरित्री । भार्या च षाड्गुण्यवतीह दुर्लभा ॥

 
कार्य प्रसंग में मंत्री, गृह कार्य में दासी, भोजन कराते वक्त माता, रति प्रसंग में रंभा, धर्म में सानुकुल, और क्षमा करने में धरित्री; इन छे गुणों से युक्त पत्नी मिलना दुर्लभ है ।
 
तमिल भाषा में, पत्नी को, “Manaivee”, अर्थात `घर का प्रमुख प्रबंधक` कहा गया है ।
 
आज भी ऐसी मान्यता है कि,"शादी-ब्याह, ईश्वर के यहाँ, पहले से तय हो जाते हैं । हम तो सिर्फ निमित्तमात्र है ।"
 


आलेख के प्रारंभ में, भले ही मैंने ये लिखा है कि, नारी को समझने का प्रयत्न,पुरूष को नहीं करना चाहिए..!! पर सच्चाई ये है कि,अगर विवाह वांच्छुक युवक-युवती, उनकी पहली मुलाकात के वक़्त ही पर्याप्त सावधानी बरतें, तो विवाहित जीवन सुखद होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है ।
 
सन-१९७० के बाद, जाति के बंधन टूटने का चलन बढ़ने की वजह से, आजकल ऐसा समय आ गया है कि, युवक-युवती शादी का फैसला खुद करते हैं जिसमें बाकी परिवारवालों को, अपने मन या बेमनसे, सिर्फ सहमति जताना बाकी होता है । इसके कई कारण है,जैसे कि, आज़ाद पीढ़ी के, आज़ाद नये विचार, सेटेलाईट क्रांति के चलते, पश्चिमी विचारधारा का बढ़ता प्रभाव, परिवार में बड़े-बुजुर्ग का घटता मान और घर से दूर, देश-परदेशमें नौकरी-धंधे के कारण, अपने समाज से अलग होने के संयोग, संतान के पुख्त होने के बाद,उनके स्वतंत्र निर्णय अधिकार के समर्थन में बने कड़े कानून,वगैरह,वगैरह..!! वैसे यह बात अलग है कि, मुग्धावस्था में शारीरिक आकर्षण के कारण, विवाह करने के, त्वरित लिए गए फैसले, कई बार ग़लत साबित होते हैं और पति-पत्नी दोनों,`न घर के न घाट के` हो जाते हैं..!!
 
हमारे देश में मनोरंजन के नाम पर, प्रसारित हो रही करीब-करीब सारी सिरियल्स में, परिवार की किसी एक बहु को `वॅम्प-अनिष्ट`के रूप में पेश करके, कथा को रोचक बनाने के मसाले कूटे जाते हैं, यह देखकर मैं सोचता हूँ, ये सारे चेनल्सवाले,किसी भी नारी को इतना ख़राब क्यों दर्शाते हैं? मगर कहानियाँ भी तो वास्तविक जीवन से ही लिखी जाती है, क्या पुरूष-क्या नारी? समाज में ऐसे अनिष्ट मौजूद है, इतना ही नहीं, ये बड़े दुर्भाग्य की बात है कि, उनकी देखा देखी, दूसरे अच्छे लोग भी, अपनी मनमानी करने के लिए, ऐसे बुरे शॉर्ट कट अपनाने लगे हैं ।
 
कर्कशा पत्नी का क्या करें?
 
हमारे देश की संस्कृति में जहाँ,`नारी को नारायणी (देवी)` का रूप माना गया हैं, उससे बिलकुल विपरीत, ऐसी कहावत भी प्रचलित है कि, "नारी अगर वश में रहे तो अपने आप से, और अगर बिगड़े तो जाएं सगे बाप से..!!" 

अर्थात नारी को प्यार से रखें तो किसी एक पुरूष के अधिपत्य में आजीवन रहती है, पर एक हद से ज्यादा, उसे प्रताडित किया जाए, तो वह अपने सगे बाप का अधिपत्य भी स्वीकारने से इनकार कर सकती है..!!"
 
हालाँकि,कर्कशा पत्नीओं की कलयुगी कहानी कोई नयी बात नहीं है, राम राज्य में भी कैकेयी-मंथरा की जुगलबंदीने, राजा दशरथ को सचमुच खटीया (मृत्युशैया) पकड़ने पर मजबूर करके, राजा  की खटीया खड़ी कर दी थी । इसी प्रकार महाभारत का भीषण युद्ध भी इर्षालु कर्कशा पत्नीओं के कारण ही हुआ था..!!

 
महान आयरिश नाट्य कार, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ( George Bernard Shaw 26 July 1856 – 2 November 1950) कहते हैं कि," जिसकी पत्नी कर्कशा-झगड़ालू होती है, उसका पति बहुत अच्छा कवि-चिंतक-विवेचक-नाट्य कार बन सकता है..!! (इस श्रेणी में, मुझे मत गिनना, मैं अपवाद हूँ..!!)
 
एकबार, एक कंपनी की ऑफ़िस में, काम से सिलसिले से मैं गया । वहाँ दोपहर की चाय-पानी का विराम काल था और कंपनी  के आला अधिकारी के साथ पूरा स्टाफ मौजूद था, ऐसे में किसी बात पर स्टाफ के एक मेम्बर ने कबूल कर लिया कि, घर में उसकी पत्नी का राज है और वह अपनी पत्नी का चरण दास है..!! फिर तो क्या था..!! जैसे अपने मन में भरे पड़े, दबाव से सब लोग छुटकारा चाहते हो, धीरे-धीरे सब स्टाफ मेम्बर्स ने कबूल किया कि, वे सब पत्नी के चरण दास है और पत्नी के आगे उनकी एक नहीं चलती..!! बाद में, सारे स्टाफ मेम्बर्स चेहरे पर मैंने,`शेठ ब्रधर्स का हाजसोल चूरन` लेने के बाद हल्के होने के भाव को उभरते देखा..!!
 
कर्कशा पत्नी को सुधारने का सही उपाय शायद यही है कि, आप पूर्ण निष्ठा भाव से, उनके चरण दास बन जाइए, बाकी सबकुछ अपने आप ठीक हो जाएगा? अगर कुछ  ठीक नहीं भी हो पाया तो, कम से कम, घर का माहौल ज्यादा बिगाड़ने से तो बच ही जाएगा..!! वर्ना..किसी रोज़ घरेलू हिंसा के, तरकटी मुक़द्दमों में फँस कर, पुलिसस्टेशन - कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने शुरू हो सकते हैं?
 
प्यारे दोस्तों,सत्य तो यही है कि,
 
१. तमाम जगह और घर-परिवार में आप पत्नी का आदर करें ।
 
२. पत्नी को ग़ुलाम या बगैर वेतन की काम वाली बाई जैसा मत समझें ।
 
३. पत्नी के प्रति आपके प्यार को, मन में ही दबाकर मत रखें, समय-समय पर उसके साथ वक़्त बीता कर, उससे प्यार का इज़हार करें ।
 
४. कम से कम अपने घर में, ऑफ़िस का रूआब मत झाड़िए,याद रखें, घर में आपकी पत्नी ही आपकी बॉस होती है..!!
 
५. सिर्फ पैसा कमाने के उद्यम में मत उलझे रहें, साल में एक-दो बार पत्नी को, दूसरे-तीसरे-चौथे प्रमोदकाल (Honey-Moon) पर ले जाएं ।
 
अगर, उपर दर्शाये सारे उपाय भीम घर का माहौल सुधारने के लिए कारगर साबित न हो,तो फिर,`आशा अमर है । सूत्र को आत्मसात करके, कर्कशा पत्नी आज नहीं तो कल सुधर जाएगी, ऐसी उम्मीद पर सारा जीवन बीताएं..!!

एक आखिरी नसिहत,आदरणीय श्री संजीव कुमार, विद्यासिन्हा की फिल्म,"पति-पत्नी और वोह" वाली `वोह` के चक्कर में कभी मत पड़ना, वर्ना आप को भी, रात-दिन ठंडे-ठंडे पानी से नहाने के दिन गुज़ारने का समय आ सकता है..!!
 
वैसे, आज आप भी, अपने सिर पर हाथ रखकर, कसम दोहरायें कि,

"मैं जो कहूँगा सच कहूँगा और सच के अलावा कुछ न कहूँगा..!!"


" क्या आप भी चरण दास हैं?"

"अरे..!! हँसना मना है, भाई..!!"

मार्कण्ड दवे । दिनांक- २०-०४-२०११.

Thursday, April 14, 2011

वेश्या उद्धारक । (कहानी )

वेश्या उद्धारक । (कहानी )
(courtesy-Google images)

शक्ल जानी पहचानी क्यों लगती है ?
दूर है  तो  पास इतनी क्यों लगती है?
लिख  चुके  हैं  कई, इसे पढ़ चुके कई,
हर गज़ल, मेरी कहानी क्यों लगती है ?

 
===========
 
" मैं  तुमसे एक बिनती करना चाहता हूँ ।" तनय ने अपना बाईक, चौराहे के पास स्थित, चाय की एक छोटी सी दुकान के नज़दीक खड़ा करते हुए, मनोज से कहा ।
 
कॉलेज के दिनों से, तनय और मनोज, दोनों जिगरी दोस्त थे । कॉलेज में, दोनों दोस्त, अगर दिन में एक बार भी, एक दूसरे से न मिल पाएँ, तो दोनों के बीच लड़ाई छिड़ जाती थीं । पर, कॉलेज के दिन तो, जैसे," ते ही दिनों गतः ।" तनय और मनोज, अब तो शायद ही कभी मिल पाते थे ।  

दोनों मित्र,  चाय की दुकान  के पास फूटपाथ पर, एक बेंच पर यंत्रवत बैठ गए । चायवाला लड़का छोटू, बगैर माँगे दोनों को, दो कटींग चाय दे गया ।
 
तनय ने फिर से वही बात, मनोज से कही," मैं  तुमसे एक बिनती करना चाहता हूँ , तु  एक बार `उसे` मिल तो सही..!! वह भी, तेरी ही जाति की है । देख मलय, मेरी बात समझने की कोशिश कर । मेरी इच्छा है की, तुम `उसे` अपनी `बहन` मान लो..!! उसका अपना, इस दुनिया में कोई नहीं है..!!"
 
तनय की यह बात सुनकर भी, मनोज ने तनय को कुछ जवाब नहीं दिया । वह जैसे कुछ ग़हरी सोच में पड गया था..!! मनोज को विचारमग्न देखकर तनय भी मौन होकर चुपचाप चाय पीने लगा ।
 
कॉलेज की पढ़ाई खत्म होते  ही, जब दोनों दोस्त आर्थिक उपार्जन के बारे में सोच रहे थे कि, क्या काम किया जाए? उसी समय तनय को एक पार्टनर मिल गया,जो की पहले से ही गृह निर्माण (बिल्डिंग कन्स्ट्रकशन) के बिज़नेस में अपने पाँव जमा चुका था । उसी पार्टनर के साथ कंपनी के कामकाज में, तनय व्यस्त हो गया । 

इधर मनोज को भी एक प्रख्यात प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई और दिनभर के अति व्यस्त कार्यक्रम के चलते, अपने दोस्त तनय से मिलना करीब-करीब बंद ही हो गया ।
 
दोनों दोस्त को अपने-अपने जीवन में व्यस्त हुए, एक-डेढ़ साल हुआ होगा की, मनोज को किसी दूसरे मित्र द्वारा पता चला, तनय ने किसी बाँसुरी नाम की लड़की से प्रेम विवाह कर लिया है ।
 
हालाँकि मनोज,तनय की शादी में न जा सका था पर, तनय के घर जब बेटा पैदा हुआ तब उसके बेटे को आशीर्वाद देने के बहाने मनोज, तनय-बाँसुरी  को मिलने चला गया ।
 
कॉलेज से अलग होने के बाद, दोनों दोस्त करीब दो साल के पश्चात मिल पाए थे,अतः दोनों ने बीते दिनों को खूब याद किया, पर पता नहीं क्यों, मनोज को ऐसा महसूस हुआ की, तनय और उसकी पत्नी बाँसुरी के प्रेम विवाह होने के बावजूद,  उन दोनों पति-पत्नी के संबंध में, मानो  बहुत बड़ी सी कोई दीवार खड़ी हो गई हो?
 
मनोज को ऐसा भी महसूस हुआ जैसे, बाँसुरी भाभी, मनोज को अपने मन में दबी हुई, कोई बात कहना चाहती थीं, पर कह न पायी हो..!! वैसे भी,  कहते हैं ना, कोई भी समझदार इन्सान किसी भी पति-पत्नी के निजी मामलों में बिना पूछे अपनी राय नहीं देता..!! मनोज ने भी यही किया ।
 
तनय और उसकी पत्नी बाँसुरी के निजी मामले में बिना पूछे कुछ बोलना उचित न समझकर मनोज ने, तनय से इधर-उधर की कुछ गपशप करने के बाद, फिर से मिलने का वायदा करके विदा ली ।
 
तनय और मनोज, दोनों दोस्तों को, एक दूसरे से मिले, करीब एक साल के बाद आज मनोज की ऑफ़िस में, तनय ने फोन करके उसे तुरंत मिलने के लिए आग्रह किया ।  शाम को ऑफ़िस से छूटते ही, वही चाय की छोटी सी दुकान पर,तनय से मिलने का वायदा किया और मनोज ने फोन रख दिया ।
 
हालांकि, आज तनय से मिलने के बाद, उसने अपनी जो दास्तान, मनोज को सुनाई, उसे सुनकर मनोज को बहुत हैरानी हुई..!! तनय की बात सुनकर मनोज का मन जड़ सा,मानो विचार शून्य  हो गया..!!
 
तनय की उटपटांग हरकतों के बारे में, मनोज अक्सर सुनता रहता था, पर तनय के जीवन में इतनी बड़ी गंभीर समस्या पैदा हुई होगी, इस बात का मनोज को ज़रा सा भी अंदाज़ा न था ।

तनय ने मनोज को बताया की, पिछले साल, वह दोनों आखिरी बार जब मिले थे, उससे पहले से, तनय और बाँसुरी के बीच ,अपने-अपने व्यक्तिगत अहंकार को लेकर, बहुत ग़हरा मनमोटाव हो गया था । 

एक दिन दोनों पति-पत्नी के बीच झगड़ा सीमा पार कर जाने पर, तनय, नाराज़ होकर, बाँसुरी और अपने  एक साल के बेटे को, उसी बंगले पर छोड़कर, अपनी नयी स्किम के अपार्टमेन्ट में, अकेला रहने चला गया । ना कभी तनय ने अपनी पत्नी बाँसुरी का हालचाल पूछा, ना कभी  बाँसुरी  ने तनय के साथ सुलह करने का इरादा जताया । वैसे भी, वह बंगला, बाँसुरी के नाम पर था और तनय हर महिना एक बड़ी सी रकम ,अपनी पत्नी बाँसुरी  को निर्वाह के लिए, पहुँचा दिया करता था ।
 
तनय और बाँसुरी, दोनों के परिवारने उन दोनों में सुलह कराने की कोशिश करके देख ली,पर परिणाम शून्य..!! 

दोनों में से कोई भी अपनी जिद्द और अहंकार छोड़कर, थोडा सा भी  झूकने को तैयार ही न था..!! और फिर दोनों के परिवार,इस रिश्ते को लेकर पहले ही नाखुश थे,इसलिए उन्होंने दोनों को समझाने का प्रयत्न करना ही छोड़ दिया ।
 
तनय के कुछ व्यावसायिक मित्रों ने भी, पति-पत्नी, दोनों के बीच सुलह कराई, पर दो-तीन दिन साथ रहने के पश्चात, फिरसे वही झगड़े के चलते, तनय और बाँसुरी, दोनों फिर से अलग हो गए ।
 
हमारे शास्त्र में जैसे लिखा है," अकेला मन शैतान का बसेरा होता है..!!" इसी न्याय अनुसार, अब तनय के अपार्टमेन्ट पर, कुछ अय्याश बिल्डर दोस्तों के साथ खाने-पीने की महफिल रोज़ सजने लगी । सिर्फ ३५ साल की तनय की अनियंत्रित जवानी को, एक दिन ३२ साल की एक देहविक्रय करने वाली वेश्या का साथ भी अनायास ही मिल गया..!! तनय का एक अय्याश दोस्त उस वेश्यासे अपना पीछा छुड़ाना चाहता था, ऐसे में तनय नामक अकेला बकरा, उसी अय्याश दोस्त (?) के जाल में बुरी तरह फँस गया ..!!
 
तनय के जीवन में ये सारी घटनाएँ,इतनी जल्दी हो गई की उसे कुछ सोचने-सँभलने का मौका तक न मिला, जब तनय को ज़रा सा होश आया तब तक तनय उस वेश्या के मोहपाश में बंध चुका था और उसका मानो ग़ुलाम सा हो चुका था ।
 
तनय की इन अय्याश हरकतों के बारे में उसकी पत्नी बाँसुरी को जब पता चला,तब अपने सत्यवान पति को, सावित्रि बनकर, उस वेश्या से पीछा छुड़ाने में सहायता करने के बजाय बाँसुरी, तनय के उस अपार्टमेन्ट पर, वक़्त बेवक़्त जाकर, अपना और अपने बेटे का भविष्य सुरक्षित करने के बहाने, तनय से ढेर सारा रुपया ऐंठने लगीं, इतना ही नहीं तनय के रिश्तेदार,संबंधी,मित्र जो भी मिले उनके पास अपनी हालत का रोना बढ़ा चढ़ा कर बयान करके, तनय को बहुत बदनाम करने लगीं..!!
 
तनय दुःखी मन से बोला,"मनोज, तुम ही बताओ, अब मैं क्या करूँ?"
 
मनोज ने देखा, दुकान के अंदर से, छोटू ने कप रकाबी धोये और वही गंदा-मैला पानी,चाय की दुकान के बाहर, फूटपाथ पर बहता हुआ, कोने में टूटी हुई जाली से, गंदी नाली में बहने लगा, काश, तनय भी, वही गंदे-मैले पानी समान इस समस्या को इसी प्रकार धो कर खुद निर्मल हो पाता..!!
 
मनोज ने बड़े सोच विचार के बाद, तनय को अपनी राय दी,"  हमारे समाज का नज़रिया ऐसा होता है की, पति/पत्नी को छोड़कर अगर कोई पराए मर्द/औरत से,नाजायझ संबंध बनाता है तो लोग,उसी को कोस ने लगते है।"
 
पर, मनोज की बात, तनय ने अनसुनी सी कर दी और उसने फिर से, मनोज पर दबाव डाला,"मैं  तुमसे एक बार फिर, बिनती करता हूँ , एक बार `उसे` मिल तो सही..!! तुम दोनों एक ही धर्म- जाति के हो । देख मनोज, मेरी बात समझने की कोशिश कर । मेरी इच्छा है की, तुम `उसे` अपनी बहन मान लो..!!

मनोज ने, तनय की गंभीर समस्या को, बड़े ध्यान से सुनी थीं, मगर समस्या इतनी गंभीर थी कि अब वह चाह कर भी, उसे सुलझा नहीं सकता था । 

" ये बात कैसे संभव है? एक वेश्या और अपनी बहन?  तनय के कहने पर, एक वेश्या को अपनी बहन मान लेने से क्या, तनय की समस्या का समाधान हो जाएगा? उसे भी तो यही समाज में रहना है,उस वेश्या की पहचान अपने रिश्तेदार, दोस्तों से वह कैसे करा पाएगा?  क्या लोग  उन दोनों के, भाई-बहन के संबंध को मान्यता देंगे? या फिर तनय  के साथ-साथ, मनोज के चरित्र पर भी शक करेंगे कि, दोनों दोस्त एक ही औरत के साथ अय्याशी कर रहे हैं? इतनी सरल बात, तनय क्यों नहीं समझ पाता?" 

ज्यादा सोचने से, मनोज का सिर अब चकराने लगा ।

 " ज्यादा सोचता क्या है? चल, तेरी बहन से, मैं तेरा परिचय कराता हूँ..!!" इतना कह कर, तनयने मनोज का हाथ थामकर, उसे अपने बाईक पर बिठा दिया और मनोज कुछ कह पाये, उससे पहले ही तनय ने बाईक भगाकर, अपने अपार्टमेन्ट के नीचे लाकर बाईक खड़ा कर दिया । मनोज अब क्या कर सकता था?  प्यारे दोस्त को नाराज़ करना भी तो ठीक न था..!!
 
तनय ने अपने अपार्टमेन्ट की डॉर बेल बजाई और किसी  निस्तेज, रसहीन औरत ने दरवाज़ा खोला । तनय और मनोज अंदर दाखिल हुए, वह औरत, दोनों के लिए पानी लेने भीतर चली गई । उसके वापस आने पर, मनोज ने देखा, ये औरत करीब  ३२ साल की थीं, मगर ४०-४५ की लग रही थी, मानो काल के ज़ोरदार थपेड़ों ने, उसे अकाल ही  वृद्धावस्था की ओर धकेल दिया हो..!!
 
अपने परम मित्र तनय की अमीरी के भव्य नुमाइश जैसे, कीमती साजो सामान से लदे, अपार्टमेन्ट में, मनोज को  बेचैनी महसूस होने लगी । वैसे भी, वह अपनी मर्ज़ी से यहाँ आया नहीं था..!! चाहे वजह कोई भी हो, पर उसके सामने, देहविक्रय करनेवाली एक औरत खड़ी थी, जिसे तनय,  मनोज की बहन का  सामाजिक दर्जा देने के लिए, उसकी मर्जी जाने बिना ही, मनोज पर,  तनय दबाव डाल रहा था ।
 
मनोज और उसकी होनेवाली `बहन` आराम से कुछ बात कर सके इसलिए," मैं  फ्रेश हो कर अभी  वापस आया..!!" इतना कह कर तनय, उस औरत और मनोज को अकेला छोड़कर, भीतर के कमरे में चला गया..!!

मनोज के लिए ये स्थिति, "न निगलते बने, न उगलते बने" जैसी निर्माण हो गई थीं ।

अचानक, वह औरत मनोज के सामने वाली कुर्सी पर आकर बैठ गई और जैसे ही, उसने मनोज से कुछ कहने के लिए, उसने अपने बंद होठ खोले..!!

बिना कुछ सोचे समझे,
बिना पीछे मुड़े, बिना वह औरत से नज़र मिलाए, बिना तनय की राह देखे, मनोज झट से खड़ा हुआ और अपार्टमेन्ट का दरवाज़ा स्फूर्ति से खोलकर, भागता-दौडता हुआ, बिल्डिंग की सीढ़ियां उतर गया..!! 

मानो उसने कोई भूत देखा हो?
 
दोस्तों, कहानी तो यहीं खत्म होती है ।

पर क्या कहानी का अंत यही होना चाहिए था?

क्या मनोज ने जो किया सही किया था?

क्या मनोज ने अपने मित्र की छोटी सी बिनती को न मानकर मित्रद्रोह किया था?

मेरे मन में, अनगिनत सवाल उठ रहे हैं और शायद मनोज के मन में भी?

अगर, आप मनोज की जगह पर होते तो क्या यही करते, जो अंत में मनोज ने किया?

सवाल ज़रा टेढ़ा ज़रूर है पर, आप तो विद्वान हैं, आप सरल जवाब दे सकते हैं..!! 

हैं ना?
 
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कहानी-मर्म ।
 
" अगर कोई व्यक्ति स्वयं को कीड़ा बना लें तो, रोंदे जाने पर उसे शिकायत नहीं करनी चाहिए ।" --- कांत
 
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मार्कण्ड दवे । दिनांक- १४-०४-२०११.

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