Showing posts with label मार्कण्ड दवे ।. Show all posts
Showing posts with label मार्कण्ड दवे ।. Show all posts
Sunday, October 30, 2016
Thursday, April 14, 2011
वेश्या उद्धारक । (कहानी )
वेश्या उद्धारक । (कहानी )
(courtesy-Google images)
शक्ल जानी पहचानी क्यों लगती है ?
दूर है तो पास इतनी क्यों लगती है?
लिख चुके हैं कई, इसे पढ़ चुके कई,
हर गज़ल, मेरी कहानी क्यों लगती है ?
दूर है तो पास इतनी क्यों लगती है?
लिख चुके हैं कई, इसे पढ़ चुके कई,
हर गज़ल, मेरी कहानी क्यों लगती है ?
===========
" मैं तुमसे एक बिनती करना चाहता हूँ ।" तनय ने अपना बाईक, चौराहे के पास स्थित, चाय की एक छोटी सी दुकान के नज़दीक खड़ा करते हुए, मनोज से कहा ।
कॉलेज के दिनों से, तनय और मनोज, दोनों जिगरी दोस्त थे । कॉलेज में, दोनों दोस्त, अगर दिन में एक बार भी, एक दूसरे से न मिल पाएँ, तो दोनों के बीच लड़ाई छिड़ जाती थीं । पर, कॉलेज के दिन तो, जैसे," ते ही दिनों गतः ।" तनय और मनोज, अब तो शायद ही कभी मिल पाते थे ।
दोनों मित्र, चाय की दुकान के पास फूटपाथ पर, एक बेंच पर यंत्रवत बैठ गए । चायवाला लड़का छोटू, बगैर माँगे दोनों को, दो कटींग चाय दे गया ।
तनय ने फिर से वही बात, मनोज से कही," मैं तुमसे एक बिनती करना चाहता हूँ , तु एक बार `उसे` मिल तो सही..!! वह भी, तेरी ही जाति की है । देख मलय, मेरी बात समझने की कोशिश कर । मेरी इच्छा है की, तुम `उसे` अपनी `बहन` मान लो..!! उसका अपना, इस दुनिया में कोई नहीं है..!!"
तनय की यह बात सुनकर भी, मनोज ने तनय को कुछ जवाब नहीं दिया । वह जैसे कुछ ग़हरी सोच में पड गया था..!! मनोज को विचारमग्न देखकर तनय भी मौन होकर चुपचाप चाय पीने लगा ।
कॉलेज की पढ़ाई खत्म होते ही, जब दोनों दोस्त आर्थिक उपार्जन के बारे में सोच रहे थे कि, क्या काम किया जाए? उसी समय तनय को एक पार्टनर मिल गया,जो की पहले से ही गृह निर्माण (बिल्डिंग कन्स्ट्रकशन) के बिज़नेस में अपने पाँव जमा चुका था । उसी पार्टनर के साथ कंपनी के कामकाज में, तनय व्यस्त हो गया ।
इधर मनोज को भी एक प्रख्यात प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिल गई और दिनभर के अति व्यस्त कार्यक्रम के चलते, अपने दोस्त तनय से मिलना करीब-करीब बंद ही हो गया ।
दोनों दोस्त को अपने-अपने जीवन में व्यस्त हुए, एक-डेढ़ साल हुआ होगा की, मनोज को किसी दूसरे मित्र द्वारा पता चला, तनय ने किसी बाँसुरी नाम की लड़की से प्रेम विवाह कर लिया है ।
हालाँकि मनोज,तनय की शादी में न जा सका था पर, तनय के घर जब बेटा पैदा हुआ तब उसके बेटे को आशीर्वाद देने के बहाने मनोज, तनय-बाँसुरी को मिलने चला गया ।
कॉलेज से अलग होने के बाद, दोनों दोस्त करीब दो साल के पश्चात मिल पाए थे,अतः दोनों ने बीते दिनों को खूब याद किया, पर पता नहीं क्यों, मनोज को ऐसा महसूस हुआ की, तनय और उसकी पत्नी बाँसुरी के प्रेम विवाह होने के बावजूद, उन दोनों पति-पत्नी के संबंध में, मानो बहुत बड़ी सी कोई दीवार खड़ी हो गई हो?
मनोज को ऐसा भी महसूस हुआ जैसे, बाँसुरी भाभी, मनोज को अपने मन में दबी हुई, कोई बात कहना चाहती थीं, पर कह न पायी हो..!! वैसे भी, कहते हैं ना, कोई भी समझदार इन्सान किसी भी पति-पत्नी के निजी मामलों में बिना पूछे अपनी राय नहीं देता..!! मनोज ने भी यही किया ।
तनय और उसकी पत्नी बाँसुरी के निजी मामले में बिना पूछे कुछ बोलना उचित न समझकर मनोज ने, तनय से इधर-उधर की कुछ गपशप करने के बाद, फिर से मिलने का वायदा करके विदा ली ।
तनय और मनोज, दोनों दोस्तों को, एक दूसरे से मिले, करीब एक साल के बाद आज मनोज की ऑफ़िस में, तनय ने फोन करके उसे तुरंत मिलने के लिए आग्रह किया । शाम को ऑफ़िस से छूटते ही, वही चाय की छोटी सी दुकान पर,तनय से मिलने का वायदा किया और मनोज ने फोन रख दिया ।
हालांकि, आज तनय से मिलने के बाद, उसने अपनी जो दास्तान, मनोज को सुनाई, उसे सुनकर मनोज को बहुत हैरानी हुई..!! तनय की बात सुनकर मनोज का मन जड़ सा,मानो विचार शून्य हो गया..!!
तनय की उटपटांग हरकतों के बारे में, मनोज अक्सर सुनता रहता था, पर तनय के जीवन में इतनी बड़ी गंभीर समस्या पैदा हुई होगी, इस बात का मनोज को ज़रा सा भी अंदाज़ा न था ।
तनय ने मनोज को बताया की, पिछले साल, वह दोनों आखिरी बार जब मिले थे, उससे पहले से, तनय और बाँसुरी के बीच ,अपने-अपने व्यक्तिगत अहंकार को लेकर, बहुत ग़हरा मनमोटाव हो गया था ।
तनय ने मनोज को बताया की, पिछले साल, वह दोनों आखिरी बार जब मिले थे, उससे पहले से, तनय और बाँसुरी के बीच ,अपने-अपने व्यक्तिगत अहंकार को लेकर, बहुत ग़हरा मनमोटाव हो गया था ।
एक दिन दोनों पति-पत्नी के बीच झगड़ा सीमा पार कर जाने पर, तनय, नाराज़ होकर, बाँसुरी और अपने एक साल के बेटे को, उसी बंगले पर छोड़कर, अपनी नयी स्किम के अपार्टमेन्ट में, अकेला रहने चला गया । ना कभी तनय ने अपनी पत्नी बाँसुरी का हालचाल पूछा, ना कभी बाँसुरी ने तनय के साथ सुलह करने का इरादा जताया । वैसे भी, वह बंगला, बाँसुरी के नाम पर था और तनय हर महिना एक बड़ी सी रकम ,अपनी पत्नी बाँसुरी को निर्वाह के लिए, पहुँचा दिया करता था ।
तनय और बाँसुरी, दोनों के परिवारने उन दोनों में सुलह कराने की कोशिश करके देख ली,पर परिणाम शून्य..!!
दोनों में से कोई भी अपनी जिद्द और अहंकार छोड़कर, थोडा सा भी झूकने को तैयार ही न था..!! और फिर दोनों के परिवार,इस रिश्ते को लेकर पहले ही नाखुश थे,इसलिए उन्होंने दोनों को समझाने का प्रयत्न करना ही छोड़ दिया ।
तनय के कुछ व्यावसायिक मित्रों ने भी, पति-पत्नी, दोनों के बीच सुलह कराई, पर दो-तीन दिन साथ रहने के पश्चात, फिरसे वही झगड़े के चलते, तनय और बाँसुरी, दोनों फिर से अलग हो गए ।
हमारे शास्त्र में जैसे लिखा है," अकेला मन शैतान का बसेरा होता है..!!" इसी न्याय अनुसार, अब तनय के अपार्टमेन्ट पर, कुछ अय्याश बिल्डर दोस्तों के साथ खाने-पीने की महफिल रोज़ सजने लगी । सिर्फ ३५ साल की तनय की अनियंत्रित जवानी को, एक दिन ३२ साल की एक देहविक्रय करने वाली वेश्या का साथ भी अनायास ही मिल गया..!! तनय का एक अय्याश दोस्त उस वेश्यासे अपना पीछा छुड़ाना चाहता था, ऐसे में तनय नामक अकेला बकरा, उसी अय्याश दोस्त (?) के जाल में बुरी तरह फँस गया ..!!
तनय के जीवन में ये सारी घटनाएँ,इतनी जल्दी हो गई की उसे कुछ सोचने-सँभलने का मौका तक न मिला, जब तनय को ज़रा सा होश आया तब तक तनय उस वेश्या के मोहपाश में बंध चुका था और उसका मानो ग़ुलाम सा हो चुका था ।
तनय की इन अय्याश हरकतों के बारे में उसकी पत्नी बाँसुरी को जब पता चला,तब अपने सत्यवान पति को, सावित्रि बनकर, उस वेश्या से पीछा छुड़ाने में सहायता करने के बजाय बाँसुरी, तनय के उस अपार्टमेन्ट पर, वक़्त बेवक़्त जाकर, अपना और अपने बेटे का भविष्य सुरक्षित करने के बहाने, तनय से ढेर सारा रुपया ऐंठने लगीं, इतना ही नहीं तनय के रिश्तेदार,संबंधी,मित्र जो भी मिले उनके पास अपनी हालत का रोना बढ़ा चढ़ा कर बयान करके, तनय को बहुत बदनाम करने लगीं..!!
तनय दुःखी मन से बोला,"मनोज, तुम ही बताओ, अब मैं क्या करूँ?"
मनोज ने देखा, दुकान के अंदर से, छोटू ने कप रकाबी धोये और वही गंदा-मैला पानी,चाय की दुकान के बाहर, फूटपाथ पर बहता हुआ, कोने में टूटी हुई जाली से, गंदी नाली में बहने लगा, काश, तनय भी, वही गंदे-मैले पानी समान इस समस्या को इसी प्रकार धो कर खुद निर्मल हो पाता..!!
मनोज ने बड़े सोच विचार के बाद, तनय को अपनी राय दी," हमारे समाज का नज़रिया ऐसा होता है की, पति/पत्नी को छोड़कर अगर कोई पराए मर्द/औरत से,नाजायझ संबंध बनाता है तो लोग,उसी को कोस ने लगते है।"
पर, मनोज की बात, तनय ने अनसुनी सी कर दी और उसने फिर से, मनोज पर दबाव डाला,"मैं तुमसे एक बार फिर, बिनती करता हूँ , एक बार `उसे` मिल तो सही..!! तुम दोनों एक ही धर्म- जाति के हो । देख मनोज, मेरी बात समझने की कोशिश कर । मेरी इच्छा है की, तुम `उसे` अपनी बहन मान लो..!!
मनोज ने, तनय की गंभीर समस्या को, बड़े ध्यान से सुनी थीं, मगर समस्या इतनी गंभीर थी कि अब वह चाह कर भी, उसे सुलझा नहीं सकता था ।
मनोज ने, तनय की गंभीर समस्या को, बड़े ध्यान से सुनी थीं, मगर समस्या इतनी गंभीर थी कि अब वह चाह कर भी, उसे सुलझा नहीं सकता था ।
" ये बात कैसे संभव है? एक वेश्या और अपनी बहन? तनय के कहने पर, एक वेश्या को अपनी बहन मान लेने से क्या, तनय की समस्या का समाधान हो जाएगा? उसे भी तो यही समाज में रहना है,उस वेश्या की पहचान अपने रिश्तेदार, दोस्तों से वह कैसे करा पाएगा? क्या लोग उन दोनों के, भाई-बहन के संबंध को मान्यता देंगे? या फिर तनय के साथ-साथ, मनोज के चरित्र पर भी शक करेंगे कि, दोनों दोस्त एक ही औरत के साथ अय्याशी कर रहे हैं? इतनी सरल बात, तनय क्यों नहीं समझ पाता?"
ज्यादा सोचने से, मनोज का सिर अब चकराने लगा ।
" ज्यादा सोचता क्या है? चल, तेरी बहन से, मैं तेरा परिचय कराता हूँ..!!" इतना कह कर, तनयने मनोज का हाथ थामकर, उसे अपने बाईक पर बिठा दिया और मनोज कुछ कह पाये, उससे पहले ही तनय ने बाईक भगाकर, अपने अपार्टमेन्ट के नीचे लाकर बाईक खड़ा कर दिया । मनोज अब क्या कर सकता था? प्यारे दोस्त को नाराज़ करना भी तो ठीक न था..!!
" ज्यादा सोचता क्या है? चल, तेरी बहन से, मैं तेरा परिचय कराता हूँ..!!" इतना कह कर, तनयने मनोज का हाथ थामकर, उसे अपने बाईक पर बिठा दिया और मनोज कुछ कह पाये, उससे पहले ही तनय ने बाईक भगाकर, अपने अपार्टमेन्ट के नीचे लाकर बाईक खड़ा कर दिया । मनोज अब क्या कर सकता था? प्यारे दोस्त को नाराज़ करना भी तो ठीक न था..!!
तनय ने अपने अपार्टमेन्ट की डॉर बेल बजाई और किसी निस्तेज, रसहीन औरत ने दरवाज़ा खोला । तनय और मनोज अंदर दाखिल हुए, वह औरत, दोनों के लिए पानी लेने भीतर चली गई । उसके वापस आने पर, मनोज ने देखा, ये औरत करीब ३२ साल की थीं, मगर ४०-४५ की लग रही थी, मानो काल के ज़ोरदार थपेड़ों ने, उसे अकाल ही वृद्धावस्था की ओर धकेल दिया हो..!!
अपने परम मित्र तनय की अमीरी के भव्य नुमाइश जैसे, कीमती साजो सामान से लदे, अपार्टमेन्ट में, मनोज को बेचैनी महसूस होने लगी । वैसे भी, वह अपनी मर्ज़ी से यहाँ आया नहीं था..!! चाहे वजह कोई भी हो, पर उसके सामने, देहविक्रय करनेवाली एक औरत खड़ी थी, जिसे तनय, मनोज की बहन का सामाजिक दर्जा देने के लिए, उसकी मर्जी जाने बिना ही, मनोज पर, तनय दबाव डाल रहा था ।
मनोज और उसकी होनेवाली `बहन` आराम से कुछ बात कर सके इसलिए," मैं फ्रेश हो कर अभी वापस आया..!!" इतना कह कर तनय, उस औरत और मनोज को अकेला छोड़कर, भीतर के कमरे में चला गया..!!
मनोज के लिए ये स्थिति, "न निगलते बने, न उगलते बने" जैसी निर्माण हो गई थीं ।
अचानक, वह औरत मनोज के सामने वाली कुर्सी पर आकर बैठ गई और जैसे ही, उसने मनोज से कुछ कहने के लिए, उसने अपने बंद होठ खोले..!!
बिना कुछ सोचे समझे, बिना पीछे मुड़े, बिना वह औरत से नज़र मिलाए, बिना तनय की राह देखे, मनोज झट से खड़ा हुआ और अपार्टमेन्ट का दरवाज़ा स्फूर्ति से खोलकर, भागता-दौडता हुआ, बिल्डिंग की सीढ़ियां उतर गया..!!
मनोज के लिए ये स्थिति, "न निगलते बने, न उगलते बने" जैसी निर्माण हो गई थीं ।
अचानक, वह औरत मनोज के सामने वाली कुर्सी पर आकर बैठ गई और जैसे ही, उसने मनोज से कुछ कहने के लिए, उसने अपने बंद होठ खोले..!!
बिना कुछ सोचे समझे, बिना पीछे मुड़े, बिना वह औरत से नज़र मिलाए, बिना तनय की राह देखे, मनोज झट से खड़ा हुआ और अपार्टमेन्ट का दरवाज़ा स्फूर्ति से खोलकर, भागता-दौडता हुआ, बिल्डिंग की सीढ़ियां उतर गया..!!
मानो उसने कोई भूत देखा हो?
दोस्तों, कहानी तो यहीं खत्म होती है ।
पर क्या कहानी का अंत यही होना चाहिए था?
क्या मनोज ने जो किया सही किया था?
क्या मनोज ने अपने मित्र की छोटी सी बिनती को न मानकर मित्रद्रोह किया था?
मेरे मन में, अनगिनत सवाल उठ रहे हैं और शायद मनोज के मन में भी?
अगर, आप मनोज की जगह पर होते तो क्या यही करते, जो अंत में मनोज ने किया?
सवाल ज़रा टेढ़ा ज़रूर है पर, आप तो विद्वान हैं, आप सरल जवाब दे सकते हैं..!!
पर क्या कहानी का अंत यही होना चाहिए था?
क्या मनोज ने जो किया सही किया था?
क्या मनोज ने अपने मित्र की छोटी सी बिनती को न मानकर मित्रद्रोह किया था?
मेरे मन में, अनगिनत सवाल उठ रहे हैं और शायद मनोज के मन में भी?
अगर, आप मनोज की जगह पर होते तो क्या यही करते, जो अंत में मनोज ने किया?
सवाल ज़रा टेढ़ा ज़रूर है पर, आप तो विद्वान हैं, आप सरल जवाब दे सकते हैं..!!
हैं ना?
===========
कहानी-मर्म ।
कहानी-मर्म ।
" अगर कोई व्यक्ति स्वयं को कीड़ा बना लें तो, रोंदे जाने पर उसे शिकायत नहीं करनी चाहिए ।" --- कांत
===========
मार्कण्ड दवे । दिनांक- १४-०४-२०११.
मार्कण्ड दवे । दिनांक- १४-०४-२०११.
Monday, April 11, 2011
आधुनिक बोधकथाएँ- ०३ `रम डॅ; अगन डे; सयाने कपिल-डे ।
आधुनिक बोधकथाएँ- ०३ `रम डॅ;अगन डे;सयाने कपिल-डे ।
(courtesy-Google images)
===========एक स्पष्टता - यह व्यंगात्मक बोध कथा का,` लोक पाल बील एपिसोड` से किसी भी प्रकार का कोई लेना देना या `स्नान,सूतकाशौच` का भी संबंध नहीं है । कृपया इसे किसी भी वर्तमान घटना के साथ न जोड़े । वैसे भी, किसी ने वर्ल्ड कप कि अद्भुत सिद्धि का जश्न भी ठीक से मनाने नहीं दिया..!!
अन्य फ़ालतू बातों से, देश के सारे लोगों का, कितने दिनो से, ऐसे ही भेजा फ्राय हो रहा है..!! अब हम, दूसरी किसी भी बात पर, अपना भेजा फ़्राय करवाने को कतई तैयार नहीं है ।
वैसे, ये बोध कथा लिखते वक़्त, मैंने भी अपने भेजे का सदुपयोग ज़रा सा भी नहीं किया है । इसे पढ़ते समय आप
भी भेजा ट्राय (फ़्राय ) मत करना,अन्यथा आपके स्वास्थ्य को महा क्षति पहुंचने का गंभीर ख़तरा है..!!
( हे प्रभु, मैंने सब को सचेत करके मेरी ज़िम्मेदारी निभाई है, अब सब सलामत की आपकी बारी..!!)
===========
आधुनिक बोध कथा-`रम डॅ;अगन डॅ;सयाने कपिल-डॅ ।
किसी एक जंगल में `रम-डॅ` और `अगन-डॅ` नामक, दो ख़ूँख़ार बिल्ले अपने-अपने तय किये हुए इलाके की खोलीयों में निवास करते थे ।
आजतक दोनों बिल्लों ने अनगिनत चूहे मार कर, संसार पर वैराग्य आने के कारण, दोनों ने भगवा वस्त्र धारण करके सन्यस्त अंगिकार कर लिया था ।
रम-डॅ और अगन-डॅ, उनकी खोली के पास से आने जाने वाले लोगों को, नीति शास्त्र का ज्ञान बांटने की सदैव कोशिश करते थे,पर कुछ जम नहीं रहा था ।
रम-डॅ और अगन-डॅ बिल्लों ने, अपनी सत्संग सभा में प्रर्याप्त भीड़ इकट्ठा करने के लिए, जंगल राज के,`जोलीवुड`फिल्मउद्योग की फ़ालतू फिल्मों मे,आलतु-फ़ालतू अभिनय करके,नाम पाने वाले कई कलाकार टारझन,टारझणी,मुगलीओं,मुंगेरी और,` बारात में न कोई पहचाने पर ,मैं दूल्हा की बुआ` जितना लं..बा उपनाम धारण करनेवाली, कुछ उन्मत्त टल्ली,मल्ली,शेख़चिल्ली के अतिरिक्त, मन ही मन प्रसिद्धि पाने के लिये तरसते रहते, दूसरे कई बाबू-बेबीओं को, दोनों बिल्लोंने अपने मंच पर आमंत्रित करके भी आज़मा लिया, पर अंत में सभी हथकंडे बेअसर ही रहे..!!
ऐसा नहीं था की लोग इकट्ठा न होते थे,लोगों का तो क्या है? कहीं भी ज़रा सी भीड़ देखी की जमा हो जाते हैं..!!
रम-डॅ और अगन-डॅ, दोनों बिल्लों की सत्संग सभा में भी लोग आते थे,पर अजीब से बेकार,अंटसंट सवाल पूछ कर, दोनों बिल्लों के नाक से दम निकाल देते थे । इतना ही नहीं, सही उत्तर न मिलने पर लोग, दोनों बिल्लों को,`Bloody Indian Dog` की गाली देकर,बिल्लों के सामने खुद ही भोंकना शुरू कर देते थे ?
रम-डॅ और अगन-डॅ, दोनों बिल्लों की सत्संग सभा में भी लोग आते थे,पर अजीब से बेकार,अंटसंट सवाल पूछ कर, दोनों बिल्लों के नाक से दम निकाल देते थे । इतना ही नहीं, सही उत्तर न मिलने पर लोग, दोनों बिल्लों को,`Bloody Indian Dog` की गाली देकर,बिल्लों के सामने खुद ही भोंकना शुरू कर देते थे ?
ऐसे में एक दिन,दोनों बिल्लोंने देखा की, ` मंतर,हो जा छूमंतर` नामक प्रसिद्ध मैदान में, समाज के माने हुए, स्वैच्छिक - अवेतन समाज सेवक, श्री पन्ना पगारे (बिना वेतन लिए?) अपनी नजरों के सामने, थाली में पड़े हुए,`जाँचपड़ताल` कंपनी के आटा से बने, एक बड़े से ब्रैड से (डबल रोटी) नाराज़ हो कर, ९५ मिनट के `आमरणांत अनसन`जाहिर करके, ब्रैड को, `TO DO (eat) OR NOT TO DO(eat)?` जैसा कुछ गहन सोच विचार कर रहे थे ।
बस फिर तो क्या था? मौका पाते ही, रम-डॅ और अगन-डॅ बिल्लों ने, उस ब्रैड को,श्री पन्ना पगारेजी की थाली से, चोरी छिपे उड़ा लिया..!!
अब दोनों बिल्लों को बहुत बड़ा जेकपोट ब्रैड के रूप में हाथ तो लग गया, मगर अपने असली स्वभाव के चलते, पूरा ब्रेड खुद अकेले ही हज़म करने के चक्कर में, दोनों बिल्ले आपस में झगड़ने लगे..!! रम-डॅ और अगन-डॅ बिल्लों का झगड़ा, बढ़ते-बढ़ते, इतना बढ़ गया की, उस ब्रैड़ को बाज़ू छोड़कर, दोनों एक दूसरे के साथ, सचमुच हाथापाई पर उतर आए..!!
रम-डॅ और अगन-डॅ बिल्ले, लड़-झगड़ कर जब, थक-हार गए,तब किसी की तालियों की आवाज़ सुनकर उन्होंने उपर देखा..!! उन्होंने देखा की, पास के ही एक वृक्ष की सब से उँची शाखा पर बैठ कर, `कपि-डॅ` नाम का बंदर, ना जाने कब से, उनकी लड़ाई, तमाशे का आनंद उठा रहा था..!!
रम-डॅ और अगन-डॅ, दोनों बिल्लों ने आपस में कुछ सलाह मशवरा करके, सयाने `कपि-डॅ` बंदर को बड़े ही नम्र भाव से बिनती की..!!
" हाय..कपि-डॅ भैया..!! सब से उंचे स्थान पर बैठकर,आप पिछले ९५ मिनट से हमारी लड़ाई देख रहे हैं? आप को यह शोभा नहीं देता..!! कृपया नीचे उतर आईए और ज़रा इस ब्रैड को, हम दोनों के बीच बराबर-बराबर बांट कर हमारा न्याय कीजिए ना..प्ली..झ..!!"
भगवा वस्त्रधारी दोनों बिल्लों द्वारा, अति नम्र भाव से की गई इस बिनतीने, कपि-डॅ बंदर को वृक्ष की उँची शाखा से, नीचे ज़मीन पर आने पर मजबूर कर दिया..!!
नीचे आकर कपि-डॅ बंदर ने सब से पहले,जंगल राज के राजा श्री मोकहसिंह को मोबाईल लगाया और रम-डॅ और अगन-डॅ, दोनों बिल्लों की समस्या के निवारण हेतु,उनका मार्गदर्शन माँगा ।
नीचे आकर कपि-डॅ बंदर ने सब से पहले,जंगल राज के राजा श्री मोकहसिंह को मोबाईल लगाया और रम-डॅ और अगन-डॅ, दोनों बिल्लों की समस्या के निवारण हेतु,उनका मार्गदर्शन माँगा ।
जब कपि-डॅ बंदर का फोन आया तब, जंगल राज के प्रामाणिक राजा श्रीमोहकसिंहजी अपनी फटीं हुई सी रहे थे..!! ` फटीं चप्पल` टाँकने का काम बाज़ू रखकर, श्रीमोहकसिंहजी ने, बड़े ही विनम्र स्वर में, दूसरे फोन पर, ना जाने किससे बात की,पर बात ख़तम होने पर, वह अपना चिरकाल मनमोहक अंदाज़ त्याग कर, बड़े मायूस से लग रहे थे..!!
अपना मनमोहक अंदाज़ त्याग कर, जंगल राज के राजा श्रीमोहकसिंहने,फोन पर, उस कपि-डॅ बंदर को, बहुत खरी- खोटी सुनाते हुए कहा..!!
" अबे साले, दो कौड़ी के बंदर, आज फिर से, तुने उपर से, मुझे डांट खिलाई ना? क्या तुझे अपने बाप-दादा के समय का ऐसा ही एक वाक्या याद नहीं है? जिस में, ऐसे ही एक ब्रेड के लिए लड़ रही, दो बिल्लीओं का न्याय करने का ढोंग रचा कर, तेरे दादा ने, उन दो बिल्लीओं का पूरा ब्रेड चटकाया था? अगर तुम्हें ये बात याद न हों तो,उपर से आदेश आया है की,जंगल राज से तेरा मंत्री पद का,पोर्टफोलियो वापस लिया जाए..!!
मजबूर राजा श्रीमोहकसिंह की, यह बात सुनकर बंदर कपि-डे क्षुब्ध हो गया, उसने सोचा, "बड़ी मुश्किल से हाथ लगे पोर्टफोलियो, मेरे हाथ से कहीं छीन ना जाए, उससे तो अच्छा यही है की, कुछ भी तिकड़म करके, मैं ये दोनों बिल्लों का ब्रैड ही क्यों न छीन लूँ?"
अपने विचार पर अमल करते हुए, कपि-डे बंदर ने, तुरंत अपने`दिमाग` नामक झोली में से, `चर्चा; वार्ता` नामक तराजू झट से बाहर निकाला..!!
कपि-डॅ बंदर, अपना सच्चा और तटस्थ न्याय अवश्य करेगा, यही विचार मन में धर कर, रम-डॅ और अगन-डॅ, बिल्ले ,बड़ी ही उम्मीद भरी नज़रों से, कपि-डॅ बंदर की ओर देखने लगे ।
कपि-डे ने,`जाँचपड़ताल` कंपनी के आटे से बनाए गए बड़े से ब्रैड को अपने दोनों हाथ से पकड़ कर, उसके एक सरीखा दश टुकड़ा किया और फिर `चर्चा; वार्ता` कंपनी के तराजू के, `दांयी समिति-बांयी समिति` नामक दो पलड़ों में, ब्रैड के पांच-पांच टुकड़े रख दिए..!!
जैसे ही, कपि-डे ने, सही तोल-वजन करने के लिए तराज़ू उठाया, "ये बंदर तोल-माप सही कर रहा है या नहीं?", ये देखने के बजाय, रम-डे और अगन-डे बिल्ले आपस में फिर से बहस करने लगे..!!
बिल्ले अगन-डॅ ने, रम-डॅ की ओर घूरते हुए कहा," रम-डॅ, दो-चार सालों से, सब के सामने, तुम बहुत बकवास कर रहे होना? आज देख लेना, जंगल राज के, ये सच्चे जवान मर्द, कपि-डॅ बंदर का सच्चा न्याय..!! अगर तेरे हिस्से में, `जाँचपड़ताल` ब्रैड का एक निवाला भी आया तो मैं, `प्रशांत` महासागर में डूब कर अपनी जान देने का वचन देता हूँ?"
अगन-डॅ की ऐसी कड़वी बात सुनकर, रम-डॅ बिल्ला तिल-मिला गया और बोला," अच्छा? अगर तेरे हिस्से में ब्रैड का एक भी टूकडा हाथ आएगा तो, मैं तुझे `कुल भूषण` का खिताब देकर, तेरा सार्वजनिक बहुमान करुंगा?"
थोड़ी ही देर में,दोनों बिल्लों के बीच, `तु-तु;में में` से आरंभ हुए झगड़ेने, फिर से भयंकर आग पकड़ ली और रम-डॅ; अगन-डॅ, दोनों में फिर से भयंकर झगड़ा शुरु हो गया..!!
इस बार तो ना जाने क्यों, झगड़ा इतना बढ़ गया की, दोनों बिल्ले उछल-उछल कर एक दूजे के शरीर को नोंचने लगे? दोनों बिल्ले के झगड़े की बात सारे जंगल में तुरंत फैल गई और उन दोनों में सुलह-संप कराने के उद्देश्य से,` मंतर,हो जा छूमंतर` मैदान में, सैंकड़ो कुल-भूषण, समझदार, बुद्धिजीवी नागरिक,`शांति`दूत बनकर, भरी दोपहर में, सूरज की उपस्थिति के बावजूद, हाथ में सुलगती हुई मोमबत्तीयाँ लेकर, उस मैदान में जमा हो गए..!!
थोड़ी ही देर में,दोनों बिल्लों के बीच, `तु-तु;में में` से आरंभ हुए झगड़ेने, फिर से भयंकर आग पकड़ ली और रम-डॅ; अगन-डॅ, दोनों में फिर से भयंकर झगड़ा शुरु हो गया..!!
इस बार तो ना जाने क्यों, झगड़ा इतना बढ़ गया की, दोनों बिल्ले उछल-उछल कर एक दूजे के शरीर को नोंचने लगे? दोनों बिल्ले के झगड़े की बात सारे जंगल में तुरंत फैल गई और उन दोनों में सुलह-संप कराने के उद्देश्य से,` मंतर,हो जा छूमंतर` मैदान में, सैंकड़ो कुल-भूषण, समझदार, बुद्धिजीवी नागरिक,`शांति`दूत बनकर, भरी दोपहर में, सूरज की उपस्थिति के बावजूद, हाथ में सुलगती हुई मोमबत्तीयाँ लेकर, उस मैदान में जमा हो गए..!!
फिर तो क्या था? जैसे शक्कर की बड़ी सी गाँठ पर,बिना निमंत्रण दिए, सैंकड़ो मख्खीयां उड़ आ बैठती है,ऐसे ही हजारों लोगों को इकट्ठा होते देखकर, कई सारी न्यूज़ चैनल के संवाददाता, हाथ में माइक और कैमरा उठाकर, पागल की भाँति दौड़ते चले आए । आते ही सारे संवाददाता, पास मे खड़ा, छोटा-बड़ा, जो भी हाथ लग जाए, उनको अंटसंट सवाल पूछ कर, खानापूर्ति साक्षात्कार करने में जुट गए ।
थोड़ी ही देर में, देश की सारी न्यूज़ चैनल पर,दोनों भगवा वस्त्रधारी बिल्ले, रम-डॅ और अगन-डॅ, के बीच हो रहे `LIVE`झगड़े की खबर,` ब्रेकिंग न्यूज़` के रूप में टीवी पर, फ्लैश होते ही, `कहीं हम भी पिछे न रह जाए?`, सोचकर, प्रिंट मीडिया के सारे अखबारवालोंने भी, अपने सभी कर्मचारीओं को,`दोपहर` की अतिरिक्त आवृत्ति छापने के धंधे पर लगा दिए..!!
इधर, लगातार शांति बनाए रखने की अपील करने के बावजूद, इन दो मूर्ख बिल्लों की वजह से, मचे भारी बवाल के कारण, अपने सारे किए कराए पर पानी फिरता हुआ देखकर, समाज के माने हुए, स्वैच्छिक-अवेतन समाज सेवक, श्री पन्ना पगारे ने ,` मंतर, हो जा छूमंतर` नामक प्रसिद्ध मैदान के सार्वजनिक मंच से, अपने ही क्रांतिकारी साथीदारों पर नाराज़ होकर, एक बार फिर, ९५ मिनट का `आमरणांत अनसन`घोषित कर दिया..!!
वैसे, ये घोषणा अवश्य सार्थक हुई.!! समाज सेवक, श्री पन्ना पगारे की, इस कठोर घोषणा से, सारा माहौल धीरे-धीरे, एकदम शांत हो गया ।
दोनों बिल्लों का लड़ने-झगडने का जुनून उतर जाने पर,उसी वक़्त थक-हार कर शांत हुए, रम-डॅ और अगन-डॅ, दोनों बिल्लों ने, अपने अपने हिस्से का `जाँचपडताल` ब्रांड ब्रैड पाने के लिए जब, कपि-डॅ बंदर को ढूंढा तब उन्होंने क्या देखा..!!
कपि-डॅ बंदर, `चर्चा-वार्ता` ब्रांड के तराज़ू के,`दांयी-बांयी समिति` नामक दोनों पलडों मे से, `जाँचपड़ताल` कंपनी का पूरा ब्रैड, खुद ही खाकर,`चर्चा-वार्ता`तराजू को फिर से अपने `दिमाग` की झोली में डालकर, कपि-डॅ बंदर उस वृक्ष की सबसे उंची शाखा के, अपने उंचे सिंहासन पर पहुंच चुका था ।
दोनों बिल्लों का लड़ने-झगडने का जुनून उतर जाने पर,उसी वक़्त थक-हार कर शांत हुए, रम-डॅ और अगन-डॅ, दोनों बिल्लों ने, अपने अपने हिस्से का `जाँचपडताल` ब्रांड ब्रैड पाने के लिए जब, कपि-डॅ बंदर को ढूंढा तब उन्होंने क्या देखा..!!
कपि-डॅ बंदर, `चर्चा-वार्ता` ब्रांड के तराज़ू के,`दांयी-बांयी समिति` नामक दोनों पलडों मे से, `जाँचपड़ताल` कंपनी का पूरा ब्रैड, खुद ही खाकर,`चर्चा-वार्ता`तराजू को फिर से अपने `दिमाग` की झोली में डालकर, कपि-डॅ बंदर उस वृक्ष की सबसे उंची शाखा के, अपने उंचे सिंहासन पर पहुंच चुका था ।
वहाँ बैठकर कपि-डॅ बंदर, बड़े ही मन-मोहक अंदाज़ और भरपेट, तृप्त स्वर में जंगल राज के प्रामाणिक राजा श्रीमोहकसिंह को, आज के एपिसोड का पूरा आंखोदेखा ब्यौरा सुना रहा था..!!
"हाँ जी सर, अब चिंता की कोई बात नहीं है..!! हमारे दोस्त, गोरे अँग्रेज़ बंदर की,सिखाई हुई, `फूट डालो,राज करो`, नीति को, हमारी काले अँग्रेज़ों की भाषा में मिला कर, उन सब आंदोलनकारीओं के बीच सफलतापूर्वक, मैंने फूट डाल दी है..!! `जाँचपड़ताल` कंपनी का ब्रैड भी, अब हमारे कब्ज़े में (मेरे पेट में) सलामत हैं । अब थोडे दिनों तक हमें शांति ही शांति है..!! हाँ,सर एक बात कहना तो भूल ही गया? समाज के माने हुए, स्वैच्छिक-अवेतन सेवक, श्री पन्ना पगारे ने ,` मंतर,हो जा छूमंतर` मैदान से, अपने ही क्रांतिकारी साथीओं पर नाराज़ होकर,फिर से, ९५ मिनट का कठोर,`आमरणांत अनसन` घोषित किया है..!! मगर इसके साथ हमारा कोई लेना देना नहीं है ? सर, अब मैं फोन रखूँ? सर, मेरा पोर्टफोलियो ज़रा मुझ से कहीं छीन न जाए, थोड़ा ध्यान रखना साहब..!!"
आधुनिक बोध- व्यक्तिगत अहम से, हमेशा देश हित सर्वोपरि होता है, यह बात सभी देशवासीओं को ज्ञात होना चाहिए ।
(खास करके, अन्य ज्ञान पिपासुओं को,रात-दिन उपदेश देने वाले साधु-संत के लिए यह ज्ञान खास आवश्यक है?)
॥ ॐ शांति शांति शांति..ही..ही..ही..ही..ही..॥
मार्कण्ड दवे । दिनांक- ११/०४/२०११.
Thursday, March 24, 2011
भड़कीले सवाल - चटकीले जवाब भाग -१.
भड़कीला SMS सवाल-"सवेरे-सवेरे मेरे नयन में आज कुछ चुभ रहा है प्रिया, कल रात ख़्वाब में शायद तुम्ही आयी थी क्या ?"
चटकीला जवाब - "ओह.., मेरे प्यारे भाई साहब, अगर आप मुझसे मुख़ातिब है तो हम, रक्षा-बंधन के शुभ पर्व पर अवश्य मिलेंगे और अगर आपने ये सवाल आपकी भावी सास (मेरी मम्मी) से किया है, तब तो ख़ुदा ख़ैर करे ।"
=======
प्यारे दोस्तों,
फ़र्स्ट अप्रैल का अप्रैलफूल-डे नज़दीक आ रहा है । हमारे कुछ दोस्तों ने, अपने मन की भड़ास निकालने के लिए, हमसे कुछ भड़कीले सवाल पूछे हैं ।
उन सारे सवालों का जवाब देना, हमारा परम मानव धर्म एवं एकमेव कर्तव्य है । दोस्तों, हम जवाब तो दे रहें हैं पर उसमें बताए गए, उपाय खुद अपनी ज़िम्मेदारी पर ही आज़माना, किसी विपरीत अंजाम के लिए हम कतई ज़िम्मेदार नहीं रहेंगे, कह देते हाँ..!!
(स्पष्टता- वैसे,यह जवाब सिर्फ हास्य-व्यंग-विनोद के लिए हैं,
आज़माने के लिए नहीं ।)
`SO, LET`S START MY FRIENDS.`
======
भड़कीला सवाल- " मैं २२ साल का नवयुवक हूँ मेरी गर्लफ़्रेंड के बग़ैर, मैं सूना सूना सा पड़ गया हूँ, क्या करुं?
चटकीला जवाब -" गर्लफ़्रेंड का दुपट्टा ओढ़कर आईने के सामने, (ब्वॉयफ़्रेंड - गर्लफ़्रेंड) दोनों रोल खुद करके देखें, शायद दिल को करार आ जाए..!!
भड़कीला सवाल- " मेरी गर्लफ़्रेंड जब रोती है तब मुझे हमेशा हँसी निकल आती है, गर्लफ़्रेंड चीड़कर रूठ जाती है । मैं क्या करुं?"
चटकीला जवाब -"अपनी गर्लफ़्रेंड के पापा और भाई से एकबार रूबरू हो आओ,गर्लफ़्रेंड के साथ-साथ आपको भी रोना आ जायेगा..!!"
भड़कीला सवाल-" मेरी शादी हो जाने के बाद मुझे पता चला है की, मेरी पत्नी बहिरी है । अब क्या करुं?"
चटकीला जवाब - "ओह..,ये तो बहुत बड़े फ़ायदे वाली बात है । आप अपनी बाहर वाली `वोह`से, फोन पर अब खुल कर बातें कर सकेंगे..!! हाँ, SMS मत करवाना, घर वाली बहिरी है-अंधी नहीं..!! "
भड़कीला सवाल-"मेरी गर्लफ़्रेंड के पापा पुलिस ईन्स्पेक्टर है और मेरे पापा शहर के बहुत बड़े डॉन है । क्या हम दोनों की शादी संभव है?"
चटकीला जवाब - "दोस्त, ये तो सोने पर सुहागा जैसी बात हो गई । शादी की बात आगे बढ़ाइए..!!"
भड़कीला सवाल-"मेरा अभी-अभी एंगेजमेन्ट हुआ है । मेरी भावी पत्नी ज़रा कम अक्ल है और मुझे अब मेरी साली पसंद है । क्या करुं?"
चटकीला जवाब - " आपके किसी कम अक्ल दोस्त के साथ, कम अक्ल भावी पत्नी से परिचय करवा कर,साली राज़ी हो तो,उसके साथ भाग जाएं..!! (पुख़्त वय का होना ज़रुरी है)"
भड़कीला सवाल-" मेरी पसंद की हुई कन्या मेरे माता-पिता को पसंद नहीं आती । ऐसा करते-करते, मैं ३४ साल तक कुँवारा रह गया । क्या करुं?"
चटकीला जवाब -" वॅ..री सिम्पल..!! माता-पिता के सामने, आप किसी ब्वॉयफ़्रेंड से शादी बनाना चाहते हैं, ऐसा ज़ाहिर कर दीजिए । सप्ताह भर में, आप की मनपसंद कन्या से शादी हो जाएगी..!!"
भड़कीला सवाल-"मुझे मेरी गर्लफ़्रेंड की सिर्फ आंखे पसंद है, गर्लफ़्रेंड नहीं, क्या करुं?"
चटकीला जवाब - "शादी के बाद काजल की फ़ैक्टरी लगाकर, गर्लफ़्रेंड-पत्नी की आंखों चौबीसों घंटे काजल लगाते रहना..!!"
भड़कीला सवाल-"मेरी गर्लफ़्रेंड ने मेरा गिफ्ट किया हुआ गुलाब का फूल, पैरों तले कुचल डाला । क्या यह सही है, अब मैं क्या करुं?"
चटकीला जवाब - " दोस्त, अब की बार,गर्लफ़्रेंड को फूलगोभी देना । कम से कम उसे तो,कुचल नहीं पाएगी,O.K?"
भड़कीला सवाल-" मैं मेरी गर्लफ़्रेंड के साथ, गार्डन में, बस ऐसे ही बैठा था,अचानक पुलिस आकर मुझे थाने ले गई । ऐसा क्यों?"
चटकीला जवाब - "दोस्त, ऐसे ही क्यों बैठा था? कुछ न करने वाले, अ-कर्मी प्रेमीओं के उपर वैसे भी पुलिस ज़्यादा ही चिढ़ती रहती है ..!!"
भड़कीला सवाल-" मेरा नाम कपिल है । मुझे वैलेंन्टाईन डे पर बजरंगदलवालोंने खूब पिटा । क्या प्यार करना गुनाह है?"
चटकीला जवाब - " आपको पहले ही अपना नाम बता देना चाहिए था, कपिल का अर्थ बजरंग होता है । मगर,आप ऐसा बंदर पना करते ही क्यूँ है?"
भड़कीला सवाल-" मेरी पत्नी मुझे पालतू कुत्ता समझती है । क्या करुं?"
चटकीला जवाब - " वफ़ादारी के लक्षण को कस कर पकड़े रखो..!!"
भड़कीला सवाल-"मेरी तुलना में,मेरी पत्नी अधिक सुंदर है । अभी-अभी शादी के बाद, उसके ढेर सारे देवर उसके आसपास मंडराने लगे हैं । क्या करुं?"
चटकीला जवाब - " आपकी पत्नी को समझा दो, हर एक देवरसे, दो-दो लाख रुपया शादी का उपहार माँगे ।दूसरे दिन से एक भी बंदा, भाभी तो क्या, आपके घर के आसपास भी दिखेगा नहीं..!!"
=======
"ANY COMMENTS."
मार्कण्ड दवे । दिनांक- २४-०३-२०११.
Subscribe to:
Posts (Atom)




