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Thursday, October 25, 2012

कानजीलाल वर्सेस कजरीवाल ? O.M.G..!


कानजीलाल  वर्सेस  कजरीवाल ? O.M.G..!




प्यारे दोस्तों,

आपने  फिल्म `ऑ..ह  माय  गॉड` देखी  है?  इस  फिल्म में  भगवान की  सत्ता को  ललकारने वाले  `कानजी  लालजी  मेहता` नामक  एक आम आदमी का  किरदार (श्री परेश  रावलजी) आपको  याद  है? हाँ, तब  तो   फिर, ये  कानजीलाल के  सारे  संवाद भी  याद  होंगे..! पता  नहीं  क्यों, मुझे  आम  आदमी  (MENGO PEOPLE )  कजरीवाल के मन  की  पीड़ा  और  ये कानजीलाल के  मन  की  पीड़ा,  एक  जैसी  लग  रही  है, आईए  देख ही  लेते  हैं..!

(नोट- यह  व्यंग आलेख  सिर्फ  मनोरंजन के  उद्देश्य  से  लिखा  गया  है, किसी  व्यक्ति-धर्म-पक्ष-परिवार-समाज से  इसका  कोई  लेनादेना  नहीं  है  - मार्कण्ड दवे ।)

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१. (वारासणी में   चोर बाज़ार  की  अपनी  दुकान के  लिए  होलसेल  मूर्तियाँ  ख़रीदते हुए ।)

कानजीलाल- " एक  बड़े  पेट वाले  गणपति  देना, एक  ढाईसो वाले  क्रिश्ना  देना और आठ  वो  बोड़ी-बिल्डर  हनुमान  देना..! कितना  हो  गया? अब  इतना  लिया है तो  फिर  तीन  सांईबाबा  तो  बोनस  मिलेगा  ना?"

/वर्सेस/

कजरीवाल- " एक  राष्ट्रीय  दामाद  लपेट  में  लिया, एक  कानून  मंत्री  भी  निपटा लिया  और   विरोधी  पार्टी  का  एक  चिल्लर  भी  ढ़ेर  हो  गया..! टोटल  तीन  हो  गया ? अब  इतनी सारी  मेहनत  के  बाद,  हिलस्टेशन  लवासा जाकर  बोनस  में   और  ग़हराई से  तफ़तीश  तो  करनी  पडेगी  ना..!"

२. ( भगवान का  अपमान  करने  पर  अपनी  पत्नी की  आस्था का  मज़ाक  उड़ाते हुए ।)

कानजीलाल- "मुझे  एक  बात  बता,  पत्नी  के  उपवास  रख़ने  से  पति  के  पाप  कैसे  धूल  सकते  हैं?"

/वर्सेस/

कजरीवाल- " मुझे  एक  बात  बता, अन्ना-रामदेव  के  उपवास  रखने  से,  इन  बेईमानों  का  ह्यदय  परिवर्तन  कैसे  हो  सकता  है?"

३. ( दहीं-हांडी कार्यक्रम में गोविंदा बने अपने  बेटे से  नाराज़ होकर ।)

कानजीलाल- "अ..रे..! मेरा  बेटा  ना  गोविंदा  बनेगा,  ना  चंकी  पांडे  बनेगा, बेवकूफ़..! मेरा  बेटा  बड़ा  होकर  क्रिकेटर  बनेगा  क्रिकेटर..समझी?"

/वर्सेस/

कजरीवाल- " मेरी  पार्टी  का  कोई  भी सदस्य  ना  लुच्चा  बनेगा, ना  लफ़ंगा  बनेगा, ठग्गीजी.! मेरा   हरेक  साथी  चुनाव  जीत  कर, देश  के  लिए   एक मिसाल  बनेगा  मिसाल..समझे?"

४. (राजस्थानी  ग्राहक  को  ठगने  के  आशय से ।)

कानजीलाल- " बद्रीनाथ  में  जब  मंदिर  बन  रहा  था  ना  तब  ज़मीन  फाड़कर  ये  मूर्ति  प्रगट  हुई  थी..! द्वारिका  के  बहुत  बड़े  साधु  जब  पदयात्रा  पर  निकले  थे तब  मैंने  उन्हें  एक  लोटा  पानी  पिलाया था  बस,  बदले  में  प्रसन्न  हो  कर  उन्होंने  मुझे  ये  मूर्ति  दी  और  ये  मूर्ति  आते  ही  मेरा  नसीब  पलट  गया ..!" 

/वर्सेस/

कजरीवाल- " दिल्ली  में  जब  भ्रष्टाचार  विरोधी  आंदोलन  चल  रहा  था   तब  अन्नाजी  के  साथ  मैं  भी  उसमें  शामिल  हुआ था  बस, बदले  में   उनसे  मतभेद  के  चलते  मुझे  ये  प्रेरणा  मिली (?) फिर,  उन्होंने  प्रसन्न  हो  कर  मुझे  आशिर्वाद  दिया  और  उनसे  अलग  होते  ही, इन   भ्रष्ट  मंत्रीओं  का  नसीब  चौपट   हुआ..!

५. (दहीं-हाँडी  कार्यक्रम  को  रूकवाने  के  आशय से  ।) 

कानजीलाल- " सुनिए, सुनिए, सुनिए, शांत  हो  जाईए..शांत  हो  जाईए..! अभी-अभी  धर्मधुरंधर  सिद्धेश्वर  महाराज ने  ये  बताया  है  कि, जगह-जगह  दहीं-हांडी  के  कार्यक्रम  में  उमड़ी  भीड़  को  देख  कर  किशन-कन्हैया  बहुत  प्रसन्न  हुए  हैं  और  आज  वो  अपने  भक्तों  के  हाथों से  दूध  और  मक्खन  खायेंगें..!"

/वर्सेस/

कजरीवाल- " सुनिए, सुनिए, सुनिए, शांत  हो  जाईए..शांत  हो  जाईए..! अभी-अभी अधर्म  धुरंधर  बे-असरकारी  सूत्रों ने  बताया  है  कि, जगह-जगह  नाना  प्रकार  की  समस्याओं  के विरुद्ध  चल  रहे  आंदोलनों  में  उमड़ी  दुःखी  भारी  भीड़  को  देख  कर  मनमोहन  भगवान  बहुत  आहत  हुए  हैं  और  आज  वो  सभी  भ्रष्ट मंत्रीओं  को  अपने हाथों  से  हथकड़ीयाँ  पहना  कर  उन्हें  जेल  भेजेगें..!"

६. ( दहीं-हाँडी  कार्यक्रम  का कबाड़ा  करने के  बाद ।)

कानजीलाल- " भगवान  का  ड़र  किसी  ओर  को  दिखाना  महाराज..! देखता  हूँ,  क्या  करेगा  भगवान..!"

/वर्सेस/

कजरीवाल- " मरने-मरवाने  का  ड़र  किसी  ओर  को  दिखाना  न्यायमंत्रीजी..! देखता  हूँ,  आपके  निर्वाचन  क्षेत्र  में  जाने-आने  पर  क्या  करेगें  बलवान..!


७. (इन्श्योरेन्सवालों  का  क्लॅम  पास  करने से  मना  करने के  बाद ।)

कानजीलाल- " हाँ,  मेरे  जैसे  पचास  कानजी के  केस  तो  चल  रहे  होंगें, मगर तुम्हारे  इस  किशन  पर  तो  किसीने  केस  नहीं  किया  होगा  ना..!  मैं   तुम्हारे  भगवान  पर  ही  केस  करूँगा..!  

/वर्सेस/

कजरीवाल- " हाँ, मेरे  जैसे  पचासों  NGO`S  के  केस  भ्रष्ट मंत्रीओं  पर  चल  रहे होंगे, मगर  आजतक  उनके  दामादों  पर  तो  किसीने  ऊँगली  नहीं  उठाई  होगी  ना.!  मैं   इस  देश के  सब से  बड़े  दामाद  पर  ही  ऊँगली  उठाऊँगा..!"

८. (कॉर्ट  रूम  में अपना केस  ख़ुद  लड़ते  हुए ।)

कानजीलाल-" दूसरा  कोई  रास्ता  ही  नहीं  है..! मि. लॉर्ड,  सारे  के  सारे  वकील  भगवान से  ड़रे  हुए  हैं  तो,  मज़बूरी  में  ये  केस  अब  मुझे  ही  लड़ना  पड़ेगा..!" 

/वर्सेस/

कजरीवाल- " दूसरा  कोई  रास्ता  ही  नहीं  है, मि. जनता,  सारे  के  सारे  पक्ष-सांसद  एक  दूसरे से  मिले  हुए  हैं  तो  फिर,   मज़बूरी  में  सरकार  की  अक्ल  अब  मुझे  ही  ठिकाने  लानी  पड़ेगी  ना..!

९. (कॉर्ट  रूम ।) 

कानजीलाल-" ये  तो  इन्स्योरन्सवालों  ने  कहा  कि,  भगवानने  तुम्हारी  दुकान गिराई  है, भगवान  से  पैसा  ले  लो, इसीलिए  मैंने  ये  केस  किया  है  वर्ना  हम  तो धंधेवाले  गुजराती  लोग  है, हमें  इस  झंझट में  पड़ना  ही  नहीं  है..!"

 /वर्सेस/

कजरीवाल- " ये  तो  सरकार  के  सारे  मंत्रीओ ने  हमें  बारबार उकसाया  कि, सरकार  की  ख़ामीयाँ   निकालना  आसान  है, एक  बार  राजनीति में  आकर  देखो, इसीलिए  हम ने  राजनीतिक  दल  बनाया  है  वर्ना,  हम तो  आम  आदमी  है, हमें  इस  झंझट में  पड़ना  ही  नहीं  है..!"

१०. (कॉर्ट रूम-"आई  ऑब्जेक्ट मि.लॉर्ड, भगवान के  सेवा कार्य  को  धंधा  कह  रहे हैं, मि.कानजी?)

कानजीलाल-" ये  धंधा  ही  है  मि.लॉर्ड..! जैसे  म्यूज़ियम में  मोम का  पुतला  दिखा कर  पैसे  लिए  जाते  हैं  बस, वैसे  ही  ये  लोग  मंदिर  में  पत्थर  का  पुतला  दिखा  कर  पैसे  ले  लेते  हैं..!  और,  पुजारीओं  की  तो  सैलरी  भी  होती  है..! इनके  धंधे  में तो  कभी   रिशेसन (Recession = मूल्यपतन)  भी  नहीं  आता..!"

 /वर्सेस/

कजरीवाल- " ये  सारे नेता लोग  इसे  धंधा  ही  मानते  है..!  पांच साल के  बाद  जैसे  ही नया चुनाव  आता  है  तुरंत, ये लोग  जनता के  सामने  बड़े-बड़े   झूठे  वायदे  दोहरा  कर  चुनाव  जीत  जाते  हैं  ..! और, सरकार से  सैलेरी, जनता से  रिश्वत, उद्योगपतिओं  के  साथ  धंधा  जमा  कर, सब कुछ  एक साथ  लूटते  हैं..! फिर, राजनीति  के  धंधे  में  तो  कभी  रिशेसन भी  (मंदी)  नहीं  आता..!""

११.(कॉर्ट रूम- "लेकिन, मंदिर वाले  आपको  पैसा  क्यूँ  दे?")

कानजीलाल-" क्यों  कि, मैंने  मंदिरो में  भी  लाखों के  प्रिमीयम  भरे  हैं..!  ये  देखिए, ये  सारी  रिसीप्ट,  उस  प्रिमीयम की  है,  जो  मैं  पिछले  अठ्ठारह  सालों से  भरता  आया  हूँ..! मि.लॉर्ड, ये  मस्जिद का  चंदा, ये  दरगाह की चद्दर, चर्च की  कैंडल, फ़क़ीर की  झोली, बाबा की  अगरबत्ती, माँ  की  चूंदड़ी (चूनरी), टोटल  दस-साढ़े दस लाख रूपया  मैं  सारी  दुकानो  में  भर  चुका  हूँ..! मेरी  सासुमाँ  बीमार  रहती  थी  तो  मंदिर वालों ने  कहा, ग्यारह  हज़ार  दो, पूजा  कराओ..फिर देखो, पूजा  कराई  और  सासुमाँ  टपक  गई..! चलो, वो  तो  अच्छा  हुआ  पर, ग्यारह  हज़ार  भी  गए? ये  लोग  तो  रिफंड भी  नहीं  देते..!"

 /वर्सेस/

कजरीवाल- " उनको  जवाब तो  देना  पड़ेगा क्यों कि, सरकार  ने  जनता से  टैक्स  वसूल  किया  है..! देखिये, आयकर, वेल्थ  टैक्स, कैपिटल  गेईन  टैक्स, सेल्स टैक्स, सर्विस  टैक्स, रोड  टैक्स, वगैरह, वगैरह..! टोटल, आज़ादी से  आजतक, इतने  सालों  में  जनता ने   करोड़ो-अरबों  रूपया  सरकारी  दुकानों में (दफ़्तरों में) भरे  हैं..! सरकार ने  कहा  था  कि, इस  टैक्स के  बदले में  आपके  लिए  आरामदायक  सुख-सुविधा  मुहैया  कराई  जाएगी  पर, ये तो  भ्रष्टाचार  कर  के  सारे  पैसे  हज़म  कर  गये  और  पूछने  पर जवाब  देने के  बजाय, हम पर  लाठीयाँ  बरसाते  है?"

१२. ( कॉर्ट रूम- छोटी-छोटी बातों के लिए भगवान पर केस नहीं किया जाता । )

कानजीलाल-"मि.लॉर्ड, ये  छोटी  बात  नहीं  है ।  मुझे  अगर  न्याय  नहीं  मिला  तो,  मैं  और  मेरा  परिवार  रास्ते  पर  आ  जायेंगें..! ये मंदिर वाले  कहते  हैं, श्रद्धा से  दान दो,  आप का  कभी  बुरा  नहीं  होगा  और  इन्स्योरन्स वाले  कहते  हैं, टाईम  पर प्रिमीयम  भरो, बुरा  हुआ  तो  हम  है  ना..! तो  मैंने तो  दान भी  दिया  है  और प्रिमीयम  भी  भरे  हैं..! और  आज  दोनों के  दोनों ने  हाथ  उपर  कर  लिए  हैं ?"

/वर्सेस/

कजरीवाल- " ये  छोटी-मोटी  लूट  नहीं  है..! जनता  को  अगर  न्याय  नहीं  मिलेगा तो  सब के सब  रास्ते  पर  उतर  आयेगें..! चुनाव के  वक़्त  इन्हों ने   ही   कहा  था कि, आप  हमें  वोट  दो  हम  आप  का  कल्याण  कर  देगें..! अब  भ्रष्टाचार  करने  के  बाद  कहते  हैं  कि, हमने  कुछ ग़लत  या  बुरा  काम  किया  है  तो  कॉर्ट  में  जाओ..! महँगाई  और सरकारी  टैक्स  भरते-भरते   हमारी  जेबें  ख़ाली  हो  गई  है  और  इन्होंने  हाथ  उपर  कर  दिए  है , हम  कॉर्ट  कैसे  जाएं?"

१३.(कॉर्ट रूम के बाहर- एक्ट ऑफ गॉड  के  ४००  करोड़ के  मुकद्दमे  दायर  होने के  बाद ।)

कानजीभाई-" महाराज, ये तो  सरकारी  जगह है, यहाँ से  तो  सुरक्षित  निकल जाओगे  लेकिन, इन  लोगों से  मंदिरो में, मस्जिदों मे, गिरिजाघरों में, किस-किस से  बचोगे?"

/वर्सेस/

कजरीवाल-" नेताजी, जब तक सरकारी गाड़ी और सुरक्षा साथ है, सुरक्षित रहोगे लेकिन, अगला  चुनाव  हार कर  जब  सारे  देश में  घूमोगे  तब  किस-किस से बचोगे?"

१४.( टीवी  इंटरव्यू  में ।)

कानजीलाल- " जिस तरह वो  माफ़िया वाले  गन  दिखा  कर  ड़राते  हैं,  ये लोग भगवान  दिखा  कर  ड़राते  हैं..! आप के  बच्चे की  कुंडली  मांगलिक  है, उसे  कालसर्प  योग है, वगैरह..वगैरह..! क्या  है  ये, उसे  साँस  तो  लेने  दो ?

/वर्सेस/

कजरीवाल-" जिस तरह  वो  माफ़िया वाले  गन  दिखा कर  ड़राते  है, ये  नेता  लोग देशी-विदेशी  विरोधीओं  को  दिखा कर  हमें  ड़राते  हैं..! आप को  आतंक  से  ख़तरा  है, आप को  विरोधी  पार्टीओं की  नीतिओं  से  ख़तरा  है,  वगैरह..वगैरह..! क्या  है  ये, हमें  किसे  वोट  देना  है, ख़ुद  ही  तय  करने  दो?"

१५.(टीवी  इंटरव्यू  में- आप के हिसाब से धर्म की परिभाषा क्या है, धर्म या मज़हब एक इन्सान की  ज़िंदगी में  क्या  काम  करता  है ?)

कानजीलाल- " मैं  समझता हूँ  जहाँ  धर्म  है,  वहाँ  सत्य के  लिए  जगह  नहीं  है  और  जहाँ  सत्य  है, वहाँ  धर्म  की  ज़रूरत ही  नहीं  है? मेरे  हिसाब से  तो  धर्म  एक ही  काम  करता  है, या तो  वो  इन्सान को  बेबस  बनाता  है  या  आतंकवादी..!"

/वर्सेस/

कजरीवाल-" मैं  समझता  हूँ,  जहाँ  किसी  पद प्राप्ति की लालसा  है,  वहाँ  देश  की सेवा  के लिए  जगह  नहीं  है  और  जहाँ  देश  सेवा की  भावना  हैं,  वहाँ  सत्ता-लालसा की  ज़रूरत ही  नहीं  है..! मेरे  हिसाब से  तो  सत्ता-लालसा  एक ही  काम  करती  है, या तो  वो  लीडर  को  भ्रष्ट  बनाती  है  या  फिर,  किसी  पक्ष, परिवार  या मंत्रीजी  का  चापलूस..!"

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मार्कण्ड दवे । दिनांकः२५--१०-२०१२.

Wednesday, October 10, 2012

राष्ट्रीय दामाद से पंगा? (व्यंग गीत)





(Google Images)

In practice, a banana republic is a country operated as a commercial enterprise for private profit, effected by the collusion (मिलीभगत) between the State and favoured monopolies, whereby the profits derived from private exploitation of public lands is private property, and the debts incurred are public responsibility.

http://en.wikipedia.org/wiki/Banana_republic



राष्ट्रीय  दामाद  से  पंगा? (व्यंग गीत) 




अरे    मूर्ख,   राष्ट्रीय   दामाद  से   क्यूँ   लिया   तुने   पंगा..!

लगता  है, `बनाना   रिपब्लिक` अनादि  से   है  भिखमंगा..!

(अनादि= अनंत )


१.


मंत्रीजी   उवाच,   `पुरानी   पत्नी   वो   मज़ा   नहीं   देती ?`

सच  होगा  शायद, साबित  हो गया  शौहर   घोर  लफंगा ?

अरे    मूर्ख,  राष्ट्रीय   दामाद  से  क्यूँ   लिया    तुने  पंगा..!


२.


मंत्रीजी  उवाच,`उनके   लिए  हमारी   जान भी   हाज़िर   है ?` 

सच    कहा,  सारा   देश   मरता  है  तो   मरे,  भूखा-नंगा..!

अरे    मूर्ख,  राष्ट्रीय   दामाद  से  क्यूँ   लिया    तुने  पंगा..!


३.


यहाँ   कौन   करेगा   जांच,  राष्ट्रीय    रद्दी   दामादों   की ?  

सुना  है, उनके  मन-मंदिर से  ज़्यादा  शौचालय  है  चंगा ?

अरे    मूर्ख,  राष्ट्रीय   दामाद  से  क्यूँ   लिया    तुने  पंगा..!

(रद्दी=  अनुपयोगी)


४.


देश  की   बरबादी   का   दूसरा  नाम  रख   दो `इतालिया` ?

फिर, बिना  शरम  कहो,  मेरे  अलावा  पूरा   देश   है  नंगा..! 

अरे    मूर्ख,  राष्ट्रीय   दामाद  से  क्यूँ   लिया    तुने  पंगा..!

(इतालिया= चरागाह= वह भूमि जो पशुओं के चरने के लिए खाली छोड़ दी गई हो । http://goo.gl/GkvaE )


नोट-  इतिहास के लेखकों के अनुसार तीसरी सदी ई. पू. में पहली बार पूरे देश का नाम इतालिया पड़ा। इतालया से ही आजकल का इताली या इटली शब्द बना। इतालिया नाम एक इतालियाई शब्द के यूनानी रूप "वाइतालिया" से लिया गया है जिसका अर्थ है "चरागाह"। यूनानी इटली को "इतालियम्" अर्थात् "चरागाह" कहते थे। 

अ..रे.., बुरा  मत  मानना, आप  मज़ाक  भी  नहीं  समझते  क्या? 


मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०९-०९-२०१२.

Monday, September 24, 2012

हमारे वोट, पेड़ पर उगते हैं क्या ? (व्यंग गीत)

(Google)



हमारे  वोट,  पेड़  पर   उगते   हैं   क्या ? (व्यंग गीत)




यूँ  लगा मानो  कि ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!

हुआ    ऐसा, एक  नेताजी  को   पीछे से    आवाज़  लगा  दी..!

1.

चुनाव  सर  पर  था  और  प्र-खर  समाज  प्रचुर  जोश में  था..!

अतः वो दौड़े  चले आए  और  फिर  लं..बी  खर-तान  लगा  दी..!

यूँ  लगा मानो  कि ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!

2.

"ज़रा   धीरे   नेताजी, आप  की   तरह, जनता   बहरी   है  क्या ?"

बोले, "चाहे   सो  कहो, दिलवा  दोगे  ना   फिर  वही  राजगद्दी ?"

यूँ  लगा मानो  कि ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!

3.

हमने   कहा, " क्यों जी   हमारे   वोट,  पेड़  पर  उगते   हैं   क्या ?

अब  इतना समझ लो, हमने आपकी  किस्मत  उल्टी  धुमा  दी..!" 

यूँ  लगा  मानो  कि  ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!

4.

बोले, "  हर  आँगन  में  हम, रुपयों  का  एक  पेड़  लगवा  देंगे..!"

हम  पर करें  वह  दूसरा  खर-प्रहार , हमने  पीठ  ही  धुमा  ली..!


यूँ  लगा  मानो  कि  ग़लती  से  हमने, गधे  की  दुम  दबा  दी..!



मार्कण्ड दवे । दिनांकः२४-०९-२०१२. 

Saturday, September 15, 2012

नेताजी, ऐसा क्यूँ होता है ? (व्यंग गीत)



(Google)



नेताजी, ऐसा  क्यूँ  होता  है ? (व्यंग गीत)




ऐसा  क्यूँ  होता  है?  नेताओं  तक  पहूँचती  नहीं, आम आदमी की चीख़ पुकार..!

ऐसा  क्यूँ  होता  है?  ठंडे  चूल्हे, खाली  थाली, पापी  पेट  पर, इतना  बलात्कार..!



अंतरा-१.


नेताजी, लाल-पीली  चौपहिया में   या फिर, हवा में   टहलो   सारी  दुनिया, मगर..!

ऐसा  क्यूँ  होता  है ? आजकल आम आदमी, दो  पहिये का भी   ना  रहा  हक़दार..!

ऐसा  क्यूँ  होता  है?  नेताओं  तक  पहूँचती  नहीं, आम आदमी की चीख़ पुकार..!


अंतरा-२.


नेताजी, धनभंडार से  घर  आप का  भरा, धानभंडार में   अनाज   है   सड़ा  हुआ..!

ऐसा  क्यूँ  होता  है? आजकल  ज़िंदगी का भी  जीना,  हो  गया  इतना  दुश्‍वार..! 

ऐसा  क्यूँ  होता  है?  नेताओं  तक  पहूँचती  नहीं, आम आदमी की चीख़ पुकार..!


अंतरा-३.


नेताजी, सब के   बीवी-बच्चे   होते  हैं, जिद्द के  भी  पक्के   होते  हैं, अब  कहिए..!

ऐसा  क्यूँ  होता  है?  रोज़,  मन   मार   कर, हम  उन्हें  फुसलाते   रहें  लगातार..!

ऐसा  क्यूँ  होता  है?  नेताओं  तक  पहूँचती  नहीं, आम आदमी की चीख़ पुकार..!


अंतरा-४.


नेताजी, अपसेट मत  होना, ज़रा  हमें भी `कसाब`के  साथ  सेट  करा  दीजिए ना..!

ऐसा क्यूँ  लगता है? हम से ज्यादा मानो,`कसाब`पर उमड़ रहा  है आप का प्यार..!   

ऐसा  क्यूँ  होता  है?  नेताओं  तक  पहूँचती  नहीं, आम आदमी की  चीख़ पुकार..!


मार्कण्ड दवे । दिनांकः१५-०९-२०१२.

Thursday, August 30, 2012

खल नेताजी की कमाई । (व्यंग)



(Google Images) 




खल  नेताजी  की  कमाई । (व्यंग)




चले   न  चले   संसद   पर,  कमाई   रहती   जारी   है ।

संसद   से  सड़क  तक  देख, लड़ाई   होती   भारी   है ।


१.


इटली  कि   किटली   जब,  चूल्हे   पे   चढ़  जाती   है..!

अच्छे   अच्छों  को   उनकी, नानी   याद   दिलाती   है ।

चले   न   चले  संसद   पर,  कमाई    रहती   जारी   है ।


२.


चमचें    हाज़िर   है    कई,  पुरखों  की   लाज   रखने । 

हंगामा   मचाने    बस,  एक   इशारा   ही    काफ़ी   है ।

चले   न   चले  संसद  पर,  कमाई   रहती   जारी   है ।


३.


नेताजी  की   देख   सारी,  हमदर्दी   भी  जाली   है ।

बुरी   नज़रवाले   तेरी,  जुबान   कितनी  काली   है..!

चले  न  चले  संसद  पर, कमाई  रहती   जारी   है ।


४.


सब्र   कर, सपनों   में  तेरे  नानी,   तेरी  भी  आयेगी ।

बाप    के   बाद   अब,  बेटे   ने   भी   बाँह  चढाई   है ।

चले   न  चले  संसद  पर,  कमाई   रहती   जारी   है ।


५.



वोट   का   है  मोल  क्या,  जनता  भोली  कब  जानेगी?

तब    तक,  खल   नेताओं   की   जेबें   रहनी  भारी   है ।  

चले   न   चले    संसद   पर,  कमाई   रहती   जारी   है ।



मार्कण्ड दवे ।  दिनांकः ३०-०८-२०१२.

Friday, August 24, 2012

नेताजी,मानता हूँ ।



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नेताजी, मानता  हूँ ।



मेरे  आख़री  निवाले  पर  भी, हक़  है  आप  का, मानता  हूँ ।


नेताजी, फिर  भी  आप  रह   जायेंगें   भूखे,  मैं   जानता  हूँ ।


१.

झूठे  -  मूठे   वर   देंगें,  रहने   को   ये   घर  देंगें,  खुशी   मना..!

कैसा  घर, कैसी  खुशी, महँगाई ने  हमें  तिल-तिल  कर  मारा ।

नेताजी,  आप  तो  कभी  न   थे   इतने  सस्ते?  मैं  जानता  हूँ ।

मेरे   आख़री   निवाले   पर   भी,  हक़  है  आप  का, मानता  हूँ ।


२.


हाल  -  बेहाल  हम  रहते   हैं   और   मजबूरी   में   जीते   हैं ।

कब का  भूल चूके  हैं  रोना, दर्द  पर  भी  हम  तो  हँसते   हैं..!

नेताजी,  दर्द   की  आँख   के  आप   सितारे   हैं , जानता  हूँ ।

मेरे  आख़री  निवाले  पर  भी,  हक़  है  आप  का, मानता  हूँ ।


३.


मत  मारी  गई  थी  हमारी, जो   हमने  आप  का  बटन  दबाया ।

जंगल  जाने   को  बचा   था, एक ही  लोटन,  वो  भी  बिकवाया?

नेताजी,  फिर   भी   आप   रह   जायेंगे   प्यासे,  मैं  जानता  हूँ ।

मेरे   आख़री   निवाले   पर    भी,  हक़  है  आप  का, मानता  हूँ ।


मार्कण्ड दवे । दिनांकः२४-०८-२०१२.

Friday, December 30, 2011

आधुनिक बोधकथाएँ. ७ - " मैं संसदताई । "




आधुनिक  बोधकथाएँ. ७ -

" मैं  संसदताई । "





"लोकशाही  को  ठोकशाही   बनाने  की  ली   है  ठान..!!
अय आम जनता, भाड़  में जा,तुं  और तेरा लोकजाल..!!"

एक स्पष्टता- इस बोधकथा का, अपने  देश  की  लोकशाही  से कोई  लेना-देना  नहीं  है ।

=====

" मैं  संसदताई । "

( दरवाज़ा- "ठक-ठक,ठक-ठक,ठक-ठक ")

संसदताई-" आती  हूँ  बाबा, ये  सुबह-सुबह  ११  बजे  कौन  आ धमका..!! कौन  है ?"

लोकजाल-" संसदताई, मैं  लोकजाल..!!"

संसदताई-" कौन ?" 

लोकजाल-" लो..क..जा..ल..अ..!!"

संसदताई- (चिढ़ते हुए)" क्या है? तुम्हें  और  कोई  काम  नहीं  है क्या ? मेरे   पुराने   ठोक-सभा  घर  से  तुझे  सहीसलामत  निकाला  तो  अब,  यहाँ   रोग-सभा  में  भी  आ  धमका ? क्यूँ आया  है  यहाँ ? क्या  है ?"

लोकजाल- "कुछ  नहीं  ताई..!! मुझे  तो  अण्णा ने  भेजा  है..!!"

संसदताई-"अरे...!! फिर  अण्णा?  कौन  अण्णा..कहाँ   के  अण्णा ?"

लोकजाल-" संसदताई,  वह  अण्णा,  अण्णा   हजारेवाले  अण्णा..!!"

संसदताई- " अरे..!! काहे  का    हजारे, कहाँ  का  ह..जा..रे..!!  सौ - दो सौ  लोगों  को  इकट्ठा  करने  से, कोई   हजारे  बन  जाता  है क्या ?"

लोकजाल-"ताई, आप  अण्णा  को  कम  आंक  रही  है, क़रीब एक  लाख़  लोगों  ने, उनके  साथ  जेल  जाने  के  लिए  अपने नाम  दर्ज  करवाये  हैं..!!" 

संसदताई-" बस..!! सिर्फ  एक  लाख़ ? मैनें  तो  सोचा  था  ८० करोड़  लोग  नाम  दर्ज  करवायेंगे..!! सा..ले, भिख़ारी कहाँ के..!! लगता है, सभी  लोगों  को, अब  जेलख़ाने  की  रोटीयां  पसंद  आने  लगी  है..!! खैर,  ये  बता, मेरे  रोगसभा  के  यह  दूसरे  घर  पर  अभी  तुं  क्यों  आया है ? अब क्या  काम  है ?"

लोकजाल-"संसदताई, आपके  घरवाले  सभी  दल  के  सांसदो ने, झूठमूठ  का  हंगामा  मचा  कर,  मुझे  ख़ाली  हाथ  वापस  लौटा दिया  है..!! आप  उनको   बराबर  डाँटिएगा..!!"

संसदताई-" क्यों  भाई..!! मैं  उन्हें  क्यों  डाँटूं ?  मैं,  क्या  तेरी, नानी  लगती  हूँ ? चल, भाग  यहाँ  से  साले..!! मेरी  इंदिराताई  के   पोते   राहुल  को  तुमने, विरोधीयों  के  साथ  मिल  कर, खून  के  आंसु  रूलाया  है  और  अब  तुम  ये  चाहते  हो  की,  मैं तुम्हारी  मदद  करूँ, भाग  यहाँ  से..!!"

लोकजाल- " ताई,  मैंने  कुछ  नहीं  किया..!!"

संसदताई-" अबे  साले  अब  भोला  बनता  है ? (रोती सूरत बनाकर) मेरी   इंदिराताई   के   नन्हे-मुन्ने  मासूम   पोते  ने,  ज़िंदगी  में  पहली  बार..पहली  बार, सांसदो  से,  तेरे    लिए..सा..ले..तेरे  लिए , बंधारणीय   दरज्जा   माँगा  था,  सब ने  मिल  कर  उस दरज्जे  की  माँग  को  दरवाज़ा  दिखा  दिया? अब  उसकी   इंदिराताई   नहीं   है, इसीलिए  सब   मेरी   इंदिराताई  के  भोले  बेटे  को   ऐसे  सता  रहे  हो  ना ?"

लोकजाल-" हैं..ई..ई..!! ये  क्या  कह  रही  हैं  संसदताई..!!"

संसदताई-" क्यों ? लग  गई  ना  पिछवाड़े  मिर्ची ? याद रखना  हमारे  बेचारे  मासूम  पोते  का  कहा  अगर  किसी ने  भी,  न  माना  तो, मैं   बारबार-लगातार, तुझे  और  तेरे  अण्णा-फण्णा, जो  भी  है..!! सब  को  ख़ून  के  आसुं  रूलाती  रहूँगी..!! सालों...कमीनों, तुम  सब  इसी  बर्ताव  के  लायक  हो..!! नालायक, चल  अब  फूट  ले यहाँ  से..!!"

(" धड़ा..म..अ.अ.अ..!!" दरवाज़ा बंद ?)

लोकजाल-" औ...फौ..औ..औ..!! संसदताई  तो  हम पर ही बिगड़  गई..!! इस  बात  को  क्या  संसदताई  और  हमारे  सारे  प्रातःस्मरणीय,  कर्तव्यनिष्ठ  माननीय (?) सांसदो  की  ओर से हमें, नये  साल  की   मूल्यवान  सौगात  समझे  क्या ? और... नये  साल  के,  इस  मूल्यवान  फ्लॉप  उपहार  का, अब  हम  सब क्या  करेंगे?"

=====

दोस्तों, "अब हम सब क्या करेंगे?" इस सवाल का आपके पास कोई जवाब है ? है  तो   फिर  बताईए..ना..आ..प्ली..ई..ई.. झ!!

आधुनिक बोध- नये साल पर मिलनेवाला हर उपहार काम का हो ये ज़रूरी नहीं है, ख़ास कर के हमने जिन पर अनहद भरोंसा  किया  हो?


मार्कण्ड दवे । दिनांकः ३०-११-२०११.   

Saturday, September 24, 2011

पत्नी..!!




(Courtesy Google images)

पत्नी..!!

प्रिय मित्र,

एक बार, एक पति देव से किसी ने सवाल किया,"पति-पत्नी के बीच विवाह - विच्छेद होने की प्रमुख वजह क्या है?"

विवाहित जीवन से त्रस्त पति ने कहा,"शादी..!!"

हमें तो इनका जवाब शत-प्रतिशत सही लगता है.!!

पति आजीवन ऐसी गलतफ़हमी में जीता है कि, मेरी पत्नी, मेरे उन ख्याल के अनुरूप, बानी-व्यवहार अपना कर,सहजीवनका सच्चा धर्म निभा रही है..!!

पर, सत्य हकीक़त यही होती है कि, विवाह के पश्चात, पति देव के ख्यालात आहिस्ता-आहिस्ता कब बदल कर पत्नी के रंग में रंग जाते हैं,पता ही नहीं चलता..!!

 हालाँकि, पति देव के मुकाबले, जगत की सभी पत्नीओं की, छठी इंद्रिय (sixth sense) बचपन से ही, जाग्रत होने की वजह से, वह ये बात अच्छी तरह जानती हैं कि, विवाहित जीवन सुखद बनाने के लिए, पति को समझने में ज्यादा समय व्यतित करना चाहिए और  उसे प्यार करने में कम से कम..!!

इसी तरह, पति देव भी, अपने नर-प्राणी होने की गुरूताग्रंथी से ग्रसित होकर, शादी के बाद थोड़े ही दिनों में समझ जाता है कि, विवाहित जीवन सुखद बिताने के लिए, पत्नी को प्रेम करने का दिखावा करने में ज्यादा समय देना चाहिए और उसे समझने के लिए कम से कम..!! (जिसे बनाने के बाद, खुद ईश्वर आजतक समझ न पाया हो, उसे कोई पति क्या ख़ाक समझ पाएगा?)

इसीलिए,ऐसा कहा जाता है कि, जीवन में दो बार आदमी, औरत को समझ नहीं पता,(१) शादी से पहले (२)शादी के बाद..!!

पत्नी को समझने में अपना दिमाग ज्यादा खर्च न करने के कारण ही, विवाहित पुरूष,किसी कुँवारे मर्द के मुकाबले ज्यादा लंबी आयु बिताते है, ये बात और है कि, विवाह करने के बाद, ज्यादातर पति देव (मर्द) लंबी आयु भुगतने के लिए राज़ी नहीं होते..!! 

 सन-१९६०-७० के दशक तक तो, भारत के कई प्रांत में,घर के मुखिया की पसंद के आगे, नतमस्तक होकर, हाँ-ना कुछ कहे बिना ही विवाह करने का रिवाज़ अमल में था । हालाँकि, ऐसे रिवाज़ के चलते कई पति-पत्नी आज भी मन ही मन अपना जीवन, किसी बेढंगी बैलगाडी की रफ़्तार से, मजबूर होकर, बेमन से संबंध निभा रहे होंगे..!!

मुझे सन-१९५८ का एक,ऐसा ही किस्सा याद आ रहा है, हमारे गुजरात के एक गाँव में, किसी कन्या को देखने के लिए गए हुए,एक युवक और उसके माता पिता को, भोजन का समय होते ही, कन्या के माता-पिता ने, मेहमानों को भोजन ग्रहण करने के लिए प्रेमपूर्वक आग्रह किया, जिसे मेहमान ठुकरा न सके । उधर  कन्या के परिवार को लगा कि, विवाह के लिए सब राज़ी है,तभी तो हमारे घर का भोजन मेहमानोंने ग्रहण किया है..!! अतः विवाह वांच्छूक युवक की झूठी थाली में, उस कन्या को उसकी माता ने भोजन परोसा । मारे शर्म के कन्या ने, अपने होनेवाले पति का झूठा  भोजन ग्रहण किया..!! हिंदु शास्त्र की मान्यता के अनुसार, जो कन्या ऐसे समय किसी युवक का झूठा खा लेती हैं तो, वह दोनों विवाह के लिए राज़ी है ऐसा माना जाता है । 

हालाँकि,बाद में पता चला कि, कन्या का वर्ण  श्याम होने के कारण, युवक इस कन्या से विवाह करने को राज़ी न था, पर परिवार के मुखिया के दबाव में आकर, उस युवक को अंत में, उसी कन्या से शादी करनी पड़ी..!!

आज भी ऐसी मान्यता है कि,"शादी-ब्याह, ईश्वर के यहाँ, पहले से तय हो जाते हैं । हम तो सिर्फ निमित्तमात्र है ।"

हमारे देश में मनोरंजन के नाम पर, प्रसारित हो रही करीब-करीब सारी सिरियल्स में, परिवार की किसी एक बहु को `वॅम्प-अनिष्ट`के रूप में पेश करके, कथा को रोचक बनाने के मसाले कूटे जाते हैं, यह देखकर मैं सोचता हूँ, ये सारे चेनल्सवाले,किसी भी नारी को इतना ख़राब क्यों दर्शाते हैं? हालाँकि,कर्कशा पत्नीओं की कलयुगी कहानी कोई नयी बात नहीं है, राम राज्य में भी कैकेयी-मंथरा की जुगलबंदीने, राजा दशरथ को सचमुच खटीया (मृत्युशैया) पकड़ने पर मजबूर करके, राजा  की खटीया खड़ी कर दी थी । इसी प्रकार महाभारत का भीषण युद्ध भी इर्षालु कर्कशा पत्नीओं के कारण ही हुआ था..!!

महान आयरिश नाट्य कार, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ( George Bernard Shaw 26 July 1856 – 2 November 1950) कहते हैं कि," जिसकी पत्नी कर्कशा-झगड़ालू होती है, उसका पति बहुत अच्छा कवि-चिंतक-विवेचक-नाट्य कार बन सकता है..!! (इस श्रेणी में, मुझे मत गिनना, मैं अपवाद हूँ..!!)

एकबार, एक कंपनी की ऑफ़िस में, काम से सिलसिले से मैं गया । वहाँ दोपहर की चाय-पानी का विराम काल था और कंपनी  के आला अधिकारी के साथ पूरा स्टाफ मौजूद था, ऐसे में किसी बात पर स्टाफ के एक मेम्बर ने कबूल कर लिया कि, घर में उसकी पत्नी का राज है और वह अपनी पत्नी का चरण दास है..!! फिर तो क्या था..!! जैसे अपने मन में भरे पड़े, दबाव से सब लोग छुटकारा चाहते हो, धीरे-धीरे सब स्टाफ मेम्बर्स ने कबूल किया कि, वे सब पत्नी के चरण दास है और पत्नी के आगे उनकी एक नहीं चलती..!! बाद में, सारे स्टाफ मेम्बर्स चेहरे पर मैंने,`शेठ ब्रधर्स का हाजसोल चूरन` लेने के बाद हल्के होने के भाव को उभरते देखा..!! 

कर्कशा पत्नी को सुधारने का सही उपाय शायद यही है कि, आप पूर्ण निष्ठा भाव से, उनके चरण दास बन जाइए, बाकी सबकुछ अपने आप ठीक हो जाएगा? अगर कुछ  ठीक नहीं भी हो पाया तो, कम से कम, घर का माहौल ज्यादा बिगाड़ने से तो बच ही जाएगा..!! वर्ना..किसी रोज़ घरेलू हिंसा के, तरकटी मुक़द्दमों में फँस कर, पुलिसस्टेशन - कोर्ट कचहरी के चक्कर काटने शुरू हो सकते हैं?

एक आखिरी नसिहत,आदरणीय श्री संजीव कुमार, विद्यासिन्हा की फिल्म,"पति-पत्नी और वोह" वाली `वोह` के चक्कर में कभी मत पड़ना, वर्ना आप को भी, रात-दिन ठंडे-ठंडे पानी से नहाने के दिन गुज़ारने का समय आ सकता है..!!

वैसे, आज आप भी, अपने सिर पर हाथ रखकर, कसम दोहरायें कि,

"मैं जो कहूँगा सच कहूँगा और सच के अलावा कुछ न कहूँगा..!!"

" क्या आप भी चरण दास हैं?"

"अरे..!! हँसना मना है, भाई..!!"

मार्कण्ड दवे । दिनांक- २०-०४-२०११.

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