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Tuesday, April 5, 2011

चिरंतन कहानियाँ ।(अकबर-बिरबल)


चिरंतन कहानियाँ ।


(courtesy-Google images)

 (अकबर-बिरबल)
 
पहले के ज़माने में राजा और उनके मंत्री आधी रात को वेष बदल कर,प्रजा का हालचाल जानने के लिए,  रात्रि चर्या के लिए निकल पड़ते थे ।
 
ऐसे ही एक बार  शहनशाह अकबर और चतुर मंत्री  बिरबल, वेष बदल कर रात्रि नगर भ्रमण को निकल पड़े ।
 
सारी रात नगर भ्रमण करते-करते, सुबह होने को आई । अकबर और बिरबल काफ़ी थक गए थे और सुबह भी होने को आई थी । इतने में, उन्होंने नगर के बाहर एक साधु-संत की कुटीर देखी ।  थोड़ा विश्राम पाने के लिए, दोनों कुटीर के आंगन में, एक बड़े से पेड़ के नीचे बैठ गए । कुछ देर बाद, संत की कुटीर के पास उगे हुए मैया तुलसीजी के पौधे की ओर,बिरबल का ध्यान गया। तुलसीमैया को देखकर, बिरबल उठ खड़ा हुआ और उसके पास जाकर पौधे को श्रद्धा पूर्वक नमन करके उसकी प्रदक्षिणा करने लगा ।
 
बिरबल की ऐसी क्रियाएं देखकर, अकबर को मज़ाक सुझा उन्होंने अज्ञान जताते हुए बिरबल से पूछा," बिरबल इस सामान्य पौधे को नमन करके तुमने उसकी प्रदक्षिणा क्यों करी?"
 
बिरबल ने बादशाह को आदर-प्रेम के साथ समझाते हुए कहा,"जहाँपनाह, हमारे धर्म में उस पौधे को तुलसी मैया कहते हैं । हमारे इष्टदेव भगवान श्रीविष्णुजी को तुलसीमाता अति प्रिय हैं, इसलिए हम तुलसीजी को माता का दर्जा देकर उनको वंदन करते हैं, उसकी प्रदक्षिणा करते हैं । आप तो सर्व धर्म समान मानते हैं, अगर आप भी हमारी तुलसीमैया को वंदन करके प्रदक्षिणा करेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा..!!"
 
पर न जाने क्यों, बादशाह आज बिरबल की मज़ाक उड़ाने के मुड़ में थे अतः, बिरबल की बात अनसुनी सी करके,  बिना कुछ कहे, वहाँ से उठकर, अकबर आगे  चल दिए ।
 
अपनी इतनी छोटी सी बात, बादशाह ने न मानी, यह देखकर बिरबल को बहुत बुरा लगा ,इसलिए मौन धारण करके, बिरबल भी अकबर के पिछे-पिछे चल पड़ा । कुछ देर के बाद, बिरबल की नाराज़गी को देखकर, अकबर को शर्म आ गई । बादशाह ने मन में सोचा," मुझे बिरबल के धर्म और आस्था की मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए। मुझ से बहुत बड़ी ग़लती हो गई ।" यह सोचकर बिरबल की नाराज़गी दूर करने के लिए बिरबल के साथ, बादशाह अन्य विषय पर बातें करने लगे । समय आने पर बादशाह को सबक सिखाने की मन में ठान कर, फिलहाल अपने मन को समझा कर, बिरबल भी, बादशाह के साथ सहज बर्ताव करने लगा । अब तो सूरज भी निकल आया था और नगर में रोज़ की तरह प्रजा की सामान्य चहल पहल भी शुरु हो गई थीं, अतः  बादशाह और बिरबल भी नगर में अपने-अपने निवास स्थान की और चलने लगे ।
 
अचानक रास्ते की एक ओर बिरबल ने, किसी जंगली वनस्पति का एक लता झुंड देखा । देखते ही मानो, बादशाह को `सर्वधर्म समभाव` का सबक सिखाने का एक अच्छा सा मौका बिरबल के हाथ लग गया । झट से बादशाह को थोड़ा सा इंतज़ार करने लिए कहकर, बिरबल ने उस जंगली वनस्पति की प्रदक्षिणा की और बादशाह की ओर अपनी पीठ करके, उस लता झुंड को गले लगा कर, उसके पत्ते को अपने बदन पर मसलने का सिर्फ अभिनय किया ।
 
बिरबल की ये अजीबो ग़रीब क्रियाएं देखकर,अकबर को मन ही मन हँसी ज़रुर फूटीं पर, उसने हँसी को होठों तक आने नहीं दी । अकबर के चेहरे पर मौन सवाल और आश्चर्य देखकर, बिना पूछे ही बिरबल ने अकबर को बताया," जैसे तुलसीजी, धर्म और आस्था के अनुसार हमारी `माता`  है, वैसे ही ये वनस्पति का ये लता झूंड हमारे धर्म अनुसार,`पिता` के समान है..!!"
 
अब तो अकबर के होठों पर हँसी के साथ सवाल फूट पडा," पर बिरबल, तुमने अपनी तुलसीमैया को सिर्फ नमन किया और यह पिताजी को अपने गले से लगाकर, उनको अपने बदन पर खूब रगड़ा..!! ऐसा क्यों?"
 
बिरबलने चेहरा गंभीर रखते हुए उत्तर दिया," हमारे धर्म के अनुसार `माता` को देवी स्वरूप मान कर, उनको सिर्फ नमन करने की परंपरा है और पिता को गले लगाकर, हम उनका बदन सहलाते हैं । मगर आप ये सब जानकर क्या करेंगे?  मगर आप तो हमारे धर्म-आस्था की मज़ाक का आनंद उठा रहे हैं,आप भी चाहे तो मेरे पिताजी को गले लगा सकते थे..!!  खैर, सुबह हो गई है..अब,च..लें?
 
बादशाह को लगा," बिरबल का कोई भरोसा नहीं ..!! बातों बातों में, भरे दरबार में, वह सब को बता देगा की, मैंने दूसरे धर्म का अपमान किया है? अब तो उसको खुश करने के लिए, बे-मन से ही सही पर, बिरबल ने  जो धार्मिक क्रिया अपने पिता के साथ की हैं, मुझे भी  उसे दोहराना चाहिए..!!"
 
अतः, बिरबल को खुश करने के लिए, अकबर  उस जंगली वनस्पति के लता झूंड़ के पास गया, उसकी प्रदक्षिणा करके, उसे गले भी लगाया और अपने बदन पर भी खूब रगडा..!!
 
आप सभी विद्वान साहित्यकार मित्रों को तो पता ही होगा की,  `कौंच` को छुने से खुजली होती है..!!
 
अकबर को सारे बदन में  बहुत खुजली होने लगी और साथ में पीड़ा भी..!! अकबर ने बदन को खुजलाते हुए, बिरबल से पूछा," अरे बिरबल तेरा ये कैसा बाप है, तुमने उसे गले लगाया तो तुम्हें कुछ असर न हुआ और मेरे सारे बदन को काट रहा है?"
 
बादशाह की ऐसी हालत देखकर, बिरबल ने  मुस्कुराते हुए  कहा," जहाँपनाह, लगता है आपने मेरी तुलसी माता का अपमान किया था उसी बात से नाराज़ और ग़ुस्सा होकर,  सज़ा देने के लिए, मेरे पिताजी आपको  बहुत काट रहे हैं। आइन्दा से किसी की भी धर्म या फिर आस्था का मज़ाक मत उड़ाना । "
 
बोध- किसी भी धर्म का मज़ाक नहीं करना चाहिए, ॥ सर्व धर्म एक समानाः ॥
 
मार्कण्ड दवे- दिनांक- ०५-०४-२०११.   

Thursday, March 31, 2011

थेंक्स पाकिस्तान,कुछ मीठा हो जाएं ?

थेंक्स पाकिस्तान,कुछ मीठा हो जाएं ?


(courtesy-Google images)
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स्पष्टता- यह  केवल  व्यंग्य-वार्ता  है, किसी भी जाति विशेष का दिल दुखाने का, लेखक का कतई इरादा नहीं है । कृपया  लेख के तत्व को, अपने माथे पर न ओढें..धन्यवाद ।

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सोहेब (सहवाग से)," छक्का लगा के दिखा?"

सहवाग (सचिन की ओर इशारा करके)," सामने तेरा बाप खड़ा है, उसे जाकर बोल..!!"

कमेन्टेटर- " और, सोहेब की गेंद पर, सचिन का ये बेहतरीन छक्का..!!"

( सभी दर्शक,खड़े होकर - `हो..हो..हो..हो.ओ..ओ..!!`)

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चम्पक और चम्पा  नाचते-गाते हुए, स्टेज पर प्रवेश करते हैं ।


"लगा सचिन का छक्का,देखो गीलानी के माथे..!!

 भागा शाहिद  दुम   दबाकर  `शहीदों`  से   आगे..!!

 हे..ई,  ता..आ,  थै..ई..या, थैया,   ता...आ..आ  थै..!!"


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चम्पा,"  हे..ई, चम्पक, हिंदुस्तान-पाकिस्तान का सेमी फ़ाइनल मैच तुने देखा क्या?"


 चम्पक," ऐसा क्यों पूछती हैं, हमने साथ बैठ कर तो  देखा था..!! भूल गई क्या?"


चम्पा," अरी बुद्धु, मैं तो ये पूछ रही थीं की, क्या तुमने मैच ध्यान से देखा था?"


चम्पक," हाँ भाई हाँ, ध्यान से ही देखना चाहिये ना?"


चम्पा," अच्छा? बोल, क्या-क्या देखा था?"


चम्पक,"हैं ना..आ..आ, पाकिस्तान की आख़िरी विकेट गिरी तब, वो, केटलकांड वाले शशीभाई, देश भ्रमण-मस्त राहुल बाबा, परम आदरणीय गंभीर-वदन सोनियाजी और दूसरे कई गणमान्य बड़े-बड़े महानुभवों को, नन्हे मुन्ने बच्चों को, खड़े होकर ताली बजाते देख, मुझे बहुत मज़ा आया ।"


चम्पा,"चम्पक, तुम  तो, बुद्धु के बुद्धु ही रहे..!!  ताली-ढोल-नगाड़ा-फटाकों का आनंद तो, खुशी से सारा देश एक साथ मना  रहा था । इसमे नयापन क्या है?"


चम्पक," चम्पा-चम्पा, अब तु ही बता दे ना? मेच में, तुने क्या खास देखा?"


चम्पा,"हमारे गाँव में, बहुत पुराना  भगवान श्रीभोलेनाथजी का एक मंदिर है । उस..में...!!


चम्पक,(चम्पा की बात काटते हुए ।)" मैच की बातों में मंदिर कहाँ से आ गया?"


चम्पा, " अगर बीच में बोला तो, मैं कुछ भी न बताउंगी..हाँ..!!"


 चम्पक," अच्छा बाबा, बीच में नहीं टोकूंगा, अब तो बता?"


चम्पा," हमारे गाँव के मंदिर के पुजारी ४० साल के हो गये मगर बेचारे कुँवारे ही रह गये थे । उनको, पैसों के बदले में, शादी कराने वाला, कोई  दलाल मिल गया और उसने ढेर सारे रुपये के बदले में पुजारी की शादी एक `दिग्विजया` नामक, बड़ी ही सुंदर कन्या से शादी करवा दी, पुजारी की शादी के जुलूसमें सारा गाँव उल्लासपूर्वक सामिल  हुआ ।"



चम्पक," फिर..,फि..र, क्या हुआ?"



चम्पा," फिर क्या? सुहाग रात को पुजारी को पता चला की, दलाल ने उन्हें ठग लिया था और सुंदर कन्या से शादी रचाने के नाम पर, सुंदर `छक्का` हाथ में थमा दिया था..!!"


चम्पक," ही..ही..ही..ही.. ये तो.. ही..ही..ही..,बहुत बुरा हुआ..!! फिर क्या हुआ?"



चम्पा," सब गाँव वालों को जब पता चला, तब कई लोग अपनी हँसी न रोक पाए और  कई समझदार लोगों ने  अफसोस व्यक्त किया । किसी ने पुजारी से पूछा की वह अब क्या ये छक्के को तलाक दे देगा? तब पुजारी ने सिर्फ इतना ही कहा की, ये जो भी है, जैसा भी है..!!  मेरे लिए दाल-रोटी बना देंगा तो, कम से कम मेरे पेट की भूख तो शांत होगी?"



चम्पक," ही..ही..ही, ये सब तो ठीक है पर,  मेच की बात में पुजारी कहाँ से आ गया?"


चम्पा," अरी,मूर्ख, देख हमारे प्रधानमंत्रीजीने, पाकिस्तान के प्रधानमंत्रीजी को बैंड-बाजा-बारात के साथ `दिविजया` नामक सुंदर कन्या से शादी के लिए आमंत्रित किया?"


चम्पक," हाँ  किया, तो..ओ..!!"


चम्पा," क्या, तो.ओ..!! फिर पाकिस्तान के प्रधानमंत्रीजी की शादी `दिग्विजया` नामक सुंदर कन्या के बजाय `पराजय` नामक  बेहतरीन `छक्के`  से  करवाई  ना..?"


चम्पक," हाँ..आँ..यार, तेरी बात तो बिलकुल सही है?"


चम्पा," ओर सुन, ३० मार्च की सेमी फ़ाइनल मेच के दो दिन बाद कौन सी तारीख आती है?"


चम्पक," पहली अप्रैल..!!"


चम्पा," अब  पाकिस्तान के प्रधानमंत्रीजी, बैंड-बाजा-बारात से साथ, हिंदुस्तान में,`दिग्विजया` से शादी करने के,बडे अरमान लेकर आएं हो और यहाँ सबने उनको एडवांस में अप्रैल फूल बनाकर,शादी के नाम पर,`पराजय` नामक छक्का गले बांध दिया हो, ऐसे में पुरे देश में ढोल-नगाडे-फटाके और आनंदोत्सव का माहौल का होना स्वाभाविक ही तो है..!!"


चम्पक," वाह..रे..मेरी चम्पाकली, तुम तो बहुत ही अक़्लमंद हो गई है ना..!! वाह..भाई..वाह..!!"


चम्पा," चम्पक, तुमने क्या, किसी देशवासी ने, ग़लती से भी, श्रीमती सोनियाजी को दोनों हाथ उपर करके कूदते हुए, राहुलबाबा को खुशी से चीखते हुए, और श्रीमनमोहनसिहजी को दंतावली दिखा कर हँसते, तालियाँ बजाते हुए, इतने बरसों में कभी देखा है?"


चम्पक," नहीं जी, कभी नहीं? सब खुश थे ।"


चम्पा,"तभी तो..!! हमारे क्रिकेट के सारे खिलाड़ियों ने पाकिस्तान को समझा दिया है की, अगर हमारा लाडला सचिन ज़िद करें की, यह मेरा आखिरी वर्ल्ड कप है और मुझे कप चाहिए । तो बिना ज्यादा प्रयत्न किए, हम सचिन के बच्चों को खेलने के लिए, वर्ल्ड कप का खिलौना भी आसानी से दिला सकते हैं । तो फिर..?"


चम्पक," फिर..? फिर क्या?"


चम्पा," सचिन की ज़िद पर हम उसे वर्ल्ड कप दे सकते हैं तो, हिंदु,मुस्लिम,सिख,ईसाई सारे देशभकत हिंन्दुस्तानीओं की ज़िद पर हम कश्मीर की एक इंच ज़मीन भी पाकिस्तान को लेने नहीं देंगे ।"


चम्पक," सही है,पर चम्पा ये तो बता?अब `पराजय` नामक छक्के से शादी तो पाकिस्तानी प्रधानमंत्रीजीने कर ली है, मगर उसे पाकिस्तान ले जाकर उसका क्या करेंगे?""



चम्पा," हाँ, बात तो सोचने वाली है..!! अब श्री युसूफ़ रझा गीलानीजी, `पराजय` को अपने घर में तो रखेंगे नहीं ? शायद पाकिस्तान जाकर उनकी सुप्रसिद्ध `हिरामंडी` बाजार में में दलालों के हवाले कर देंगे..!!"


चम्पक," ही..ही..ही..ही..ई..ई..ई..!!"


चम्पा," इतना हँस क्यों रहा है?"


चम्पक," अब मैं  तूझे राज़ की एक बात बताऊं?"


चम्पा, "क्या?"


चम्पक," पाकिस्तानी प्रधानमंत्री युसूफ़ रझा गीलानीजी के हाथ में `छक्का` थमाने की साज़ीश में, सारे पाकिस्तानी ख़िलाडी शादी करानेवाले दलाल के साथ मिले हुए थे?"



चम्पा," हें..ई..ई..ई, शाबाश चम्पक, ये क्या कह रहा है?"


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" ANY COMMENT?"


मार्कण्ड दवेः दिनांक- ३१ मार्च २०११.

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Monday, March 28, 2011

चड्डी सँभाल तोरी,नेताजी ।

चड्डी सँभाल तोरी,नेताजी ।
 (courtesy-Google images)

" इज़्ज़त  का  फालुदा  तेरा, जगह जगह  बिकता है ।
  लिज्ज़त लेकर, ईर्षालु देख, भीतर भीतर जलता है ।"

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प्यारे दोस्तों,

आजकल हमें तो बहुत ही मज़ा आ रहा है ..!!

विकिलीक्स का `चड्डी खींच, लिकेज कर अभियान`,  रोज़ नये-नये लोगों की चड्डी खींच रहा है और सभी, सम्माननीय महानुभव जो की आजतक दूसरों की `चड्डी की खींचतान` के अद्भुत नज़ारे का लुत्फ़ बड़े चाव से उठा रहे थे, वही लोग अब अपनी-अपनी चड्डी सँभालने में जुट गये हैं । ये तो वही बात हुई की..!!

" न खलु अक्षिदुःखितः अभिमुखे दीपशिखां सहते । "

अर्थात - नज़र का बीमार आदमी दीपशिखाकी रौशनी को सहन नहीं कर सकता ।   

`विक्रमोर्वशीयमम्` - महाकवि कालिदास ।

अब आप के मन में सवाल उठने वाला है की,"विकिलीक्स द्वारा जितने  नेताओं की चड्डी खींची गई है, उनको आइन्दा अपनी चड्डी सँभालने के बारे में क्या-क्या सावधानी बरतनी चाहिए?"


इसी संदर्भ में, मुझे बचपन का, हमारे गाँव का, एक क़िस्सा याद आ रहा है । मैं  करीब ६-७ साल का था । हमारे गाँव में एक विवाहित महिला का पति और सास-ससुर, उसे  दहेज़ के लिए हर क्षण प्रताड़ित करते रहते थे । विवाहिता को फटीचर साडीमें देखकर,उसी  गाँव में, खेतीबाडी करते, विवाहित महिला के पिता और भाई का दिल बहुत दुखता था । पर क्या करें?


एक बार त्योहार के मौके पर,वह महिला के पिता और भाई ने  उपहार के रुप में बेटी-बहन को नयी महँगी साड़ी दिलाई । अब वह विवाहिता की सास ने नयी अच्छी सी साड़ी देखकर, ज़बरदस्ती बहु से  साड़ी लेकर झट से, ये नयी महँगी साड़ी, पास ही में ब्याही अपनी बेटी को  भेंट कर दी । अपने पिता और भाई का दिया हुआ उपहार, अपनी ननन्द को देने से, फटेहाल साड़ी में लिपटी हुई, विवाहिता के मन को बहुत ग़हरी ठेस पहुँची ।


ससुर पक्ष को सबक सीखाने के लिए, वह ग़ुस्साई बहु ने बड़ा अजीब सा तरीक़ा अपनाया । फिल्म `राजा बाबू`में, विलन कॉमेडियन शक्ति कपूर ने पहनी थीं वैसी ही,अपने पति की लंबी, धूटनों तक पहुँचती  नाडा लटकी चड्डी (कच्छा) और पति का लंबा शर्ट पहनकर गाँव के दूसरे छोर पर, नदी से  पानी भरने के लिए, सिर पर घड़ा उठाए विवाहिता, सरे बाज़ार, गाँव की भीड़भाड़ भरी गलीओं के बीच होते हुए चल पड़ी ।


गाँव की बहु-बेटी की इज़्ज़त तार-तार करनेवाला, आधातजनक दृश्य देखकर सारा गाँव मारे शर्म के पानी-पानी हो गया । मामला गाँव की बहु-बेटी के संबंधित था, अतः  ये  मामला गाँव के प्रतिष्ठित पंच के पास पहुंचा, सारे गाँव के सामने पंचोने, इस विवाहिता की सासरीवालों को बहुत जमकर फटकार लगाई और आगे से अपनी बहु को बेटी मानकर, बहु को अच्छे से रखने का आदेश दिया । बहु की साड़ी पर हक़ जमाने वाले सासरीवालों की खुद की चड्डी बहु ने सरे आम खींची । बाद में बहु के साथ,समय रहते, सब कुछ अच्छा हो गया ।


पता नहीं..!! विकिलीक्सवाले जूलियन असांजे दुनियाभर के महान नेताओं की चड्डी खींच कर, उन चड्डीओं का क्या करना चाहते हैं ? हमें तो लगता है, विकिलीक्स के सारे दस्तावेज़ लिक हो जाने के बाद,जूलियन असांजे,  सारे महान, प्रातःस्मरणीय, आदरणीय इंटरनेशनल नेताओं की, ईकठ्ठी की गई बहुमूल्य चड्डीयों का बड़ा...सा  शॉ-रूम शुरू करेंगे ।


आजकल जूलियन असांजे ने, रोज़ `एक तीर से  एक साथ कई नेताओं की चड्डी खींचाई अभियान`` के तहत,  आज फिर से भाजपा के नेता श्रीअरूण जेटली की चड्डी खींची है । अब, हम क्या करें?


वैसे तो `चड्डी खींचतान अभियान` का अर्थ होता है,`किसी की इज़्ज़त का फालुदा करना, किसी का अपमान करना, वग़ैरह, वग़ैरह..!!


सब से बड़ा सवाल यह है की, विकिलीक्स क्या सब के साथ मज़ाक कर रहा है?


लेकिन, मज़ाक में तो एक हद होती है और इस `चड्डी खींचाई अभियान` बेहद है ?


विकिलीक्स आयें दिन जो भी लिक कर रहा है, वह बहुत बदबूदार है..!! लिक हो रहे सारे दस्तावेज़, किसी की मज़ाक उड़ाने के हेतु सार्वजनिक नहीं हो रहे, मगर बड़े लोग की, निजी सोच और सार्वजनिक सोच में, सचमुच  उत्तर-दक्षिण  दिशा का अंतर होने के साथ ही, ये सारे नेताओं की सोच कितनी घटिया और दोगली होती है, यही बात, वह उजागर कर रहे हैं ।


हर एक दस्तावेज़ के सार्वजनिक होने के साथ, संबंधित सब की चड्डी खींच के, जूलियन असांजे  अपने नये शॉ-रूम के लिए मानों,  अमूल्य चड्डीओं का, `ऑक्सन-नीलामी` करने के लिए नेताओं की चड्डीओं को जमा कर रहे हैं और जिसकी चड्डी खींची गई हो, वह सार्वजनिक तौर पर सरे-आम नंगा दिखने लगता है ।


दोस्तों, आप को तो पता ही है की, सन-१९७० तक दूर-दराज़ के देहाती इलाक़ो में रेडियो, पुरे गाँव में  शायद ही, किसी एक-दो घर में सुनने को मिलता था । गाँववालों मे से, टी.वी. तो ख़्वाब में भी शायद ही किसी ने देखा हो । ऐसी स्थिति में गाँव की सारी महिलाएँ किसी एक महिला के  घर के बरामदे में इकट्ठा होकर, हर रोज़ दोपहर घर के कार्यावकाश के समय, समाज के बड़े-बड़े सूरमाओं के घर-कुटुम्ब की पोल खोलने,`चड्डी खींचाई परिषद में` प्रवृत्त हो जाती थीं । इस परिषद में `चड्डी खींचाई अभियान` द्वारा सारे गाँव के  अच्छे बुरे समाचार में अपनी ओर से, नमक, मिर्च, मसालों का बढ़िया तड़का लगाकर, समाचार को विकृत कर के, `सर्व स्वीकृत` होने लायक टेस्टी बनाकर , कहाँ से कहाँ तक कर्णोपकर्ण पहुंचाने की क्षमता रखती थीं । हाँ, ये बात ओर है की महिला मंडल के संनिष्ठ प्रयत्न के कारण, कई बार सच्चे समाचार का पूरा स्वरूप ही बदल जाता था ।


ऐसे समाचार का स्रोत कुछ भी हो सकता था, जैसे की `बरामदा महिला मंडल` में, उपस्थित-अनुपस्थिति सास-बहु, माँ-बेटी,ननन्द-भाभी और कई बार पांच-दस पैसे की लालच में हमारे जैसे छोटे-बड़े बच्चें भी, इस महिला परिषद के, ख़बरी बनने को तैयार हो जाते थे ।


हालांकि, शास्त्रोंमें अपने घर की बातें सार्वजनिक करने के बारे में कहा गया है कि,


"अपृष्टो नैव कथयेद गृहकृत्यं तु कं प्रति।
बहवार्थाल्पाक्षरं कुर्यात्‌ सल्लापं कार्यसाधकम्‌ ॥ "


अर्थात - कई लोगों को अपने घर की निजी बातें जाहिर करने की खराब आदत होती है । अपने घर या कार्य संबंधी बातों को किसी के पूछने पर ही जाहिर करना चाहिए । हमेशा अर्थ पूर्ण, संक्षिप्त और कार्य सिद्ध करानेवाले  उत्तर देने की आदत डालनी चाहिए ।


चड्डी खींचाई अभियान और हम..!!


यह सन-१९५८ की बात है, मैं उस वक़्त बहुत छोटा सा था इसलिए दोपहर की बरामदा-महिला परिषद में मुझे एक एडवान्टेज मिलता था,`इतना छोटा बच्चा,महिलाओं की निजी बातों को क्या समझेंगा?` ऐसा मानकर मेरी उपस्थिति का कोई महिला कभी विरोध नहीं करती थीं ।


ये सभी महिलाएँ, जब कभी किसी की निजी सेक्सी बातें करनी हो तो, इशारे से अथवा तो प्रत्येक शब्द के आगे `अस्म-कस्म-मस्म-चस्म` जैसा कुछ जोड़कर, कोड वर्ड की भाषा का प्रयोग करती थी और बाद में पता नहीं, सारी महिला परिषद ज़ोर-ज़ोर से ठहाका मार कर हँसती थीं। (ऐसे में मुझे बहुत बुरा लगता था- मेरे जैसे छोटे बच्चे के साथ इतना बड़ा चिटींग-ख़ुफ़ियापन?)


बरामदा महिला परिषद में शृंगार रस और साहस से भरी रसवंत बातचीत का दौर शुरु होते ही, बात लंबी चलने की आशंका के कारण कई महिलाएं, पहले ही बाथरुम हो आती थीं, जिससे बात में रसक्षति का ख़तरा टल जाए ।


मैं भी इधर-उधर देखकर,मानो कुछ न समझने का ढोंग रचा कर, किसी कुशल अभिनेता की भाँति असरदार अभिनय कर के,  मेरे कान को ओर तेज़ कर लेता था । वैसे तो उस वक़्त मुझे ठीक से चड्डी पहनना भी आता नहीं था । शायद इसी वजह से यह निंदा-रसिक महिलाओं की कुछ-कुछ बातें मेरी समझ सीमा के पार होती थीं ।


हाँ, अक्सर ऐसा होता था उन महिलाओं की बातों के बीच अगर कोई बाल कथा जैसा प्रसंग आ जाए, तब मैं उसे ध्यान से सुनता, बार बार रटता और फिर उसमें नमक, मिर्च, मसाला डालकर अच्छा सा तड़का लगाकर, इस कथा को और रोचक बनाकर हमारे बच्चों की महोल्ला परिषद में उसे पेश करके, दूसरे बच्चों से ज्यादा, विद्वान और ज्ञानी होने का दंभ मैं रचाता था ।(शायद, आज भी मैं वैसा ही हूँ..!!)


अमेरिकन मेजर लिग बेसबॉल के स्पेशयल आसिस्टन्ट जनरल मैनेजर मिस्टर-रॉबर्ट स्कॅफर का कहना है की," आपकी अंगत परेशानियाँ किसी ओर को मत सुनाईए क्योंकि सुनने वालों में से ज्यादातर व्यक्तिओं को इसकी कोई दरकार नहीं होती और बाकी व्यक्ति इसे सुनकर मन ही मन खुश होगें ।"


मिस्टर रॉबर्ट की यह बात सुनकर, आप सबको भी हैरानी होती होगी की, अपने-अपने क्षेत्र में सर्वोच्च शिखर तक पहुँच कर भी, विकिलीक्स जिन महानुभवों की चड्डी खींच रहा है, उनको क्या इतना भी ज्ञान नहीं है की अपने मन का भेद किसे बताना चाहिए और किसे नहीं ? ये सारे सम्माननीय नेता ऐसी बेवकूफी कैसे कर सकते हैं..!!


मेरे खयाल से,पंडित नहेरुजी के समय से, किसी गोरी चमड़ी को देखकर, उनसे अत्यंत प्रभावित होने की, या फिर अपने देश या पक्ष की थोड़ी बहुत जानकारी की लॉलीपोप अमेरिकन राजदूतोंको चटा कर, अमेरिका से अपने कुछ निजी स्वार्थ साधने की चेष्टा के कारण ही, ऐसी बेवकूफी हो सकती है । फिर ख़ुदग़र्ज़ नेताओं को ये थोड़े ही पता था की, जूलियन असांजे, शाम सवेरे, हाथ धो कर, उनकी चड्डी के पीछे पड़ने वाला है?


खैर, अब  जो हो रहा है, उसे  कोई रोक तो नहीं सकता । मगर ऐसे नंगेपन की ये सारे नेता लोग आदत तो डाल ही सकते हैं ।


हिन्दी फिल्म,`वक़्त`में  महामंडलेश्वर श्री..श्री..श्री..पूज्य १००८ संत शिरोमणि अभिनेता श्रीराजकुमारजी (जा..नी..ई..ई,) ने सही फरमाया है, "जो खुद शीशे के घर में रहते हो, वह किसी दूसरे के घर पर पत्थर नहीं फेंका करते जा..नी..ई..ई..!!"


अ..हा..हा..हा..!! कल्पना मात्र से, मैं रोमांचित हो उठता हूँ । ज़रा आप भी कल्पना कीजिए, विकिलीक्स के द्वारा सभी देशों के मांधाताओं की  सारी चड्डीयां  खींच ली गई है  और अब मिस्टर जूलियन असांजे ने, अपने चड्डीओं के शॉ-रुम के बाहर, सारे नेताओं से, ईकठ्ठी की  गई  तमाम चड्डीओं  पर, उन सब नेताओं के नाम का टॅग लगाकर, `सार्वजनिक चड्डी ऑक्सन`(नीलामी) आयोजित किया है ।


 अ..हा..हा..हा..!! हम जैसे लोगों के लिए `सार्वजनिक चड्डी नीलामी` का,  ये अद्भुत नज़ारा कितना`रोचक` होगा और जिन महानुभवों की चड्डीओं की नीलामी हो रही है, उन सब नेताओं के लिए ये नज़ारा कैसा `रेचक` रहेगा..!!


हालांकि, `चड्डी खींचाई अभियान` का सच्चा लुत्फ़ तो सारे प्रिंट और न्यूज़ टीवी, मिडीयावाले उठा रहे हैं? विकिलीक्सके खुलासेमें, जो महानुभव पकड़े जाते हैं, उनकी बॉडी लेन्ग्वेझ से लेकर उनकी सात पुश्तों तक की जानकारी लेने-देने में सब संवाददाता एक साथ जुट जाते हैं..!! चलो, उनका  पेट भरने की ज़िम्मेदारी भी इन्हीं चड्डी-दाता नेताओं पर ही तो है..!!


वैसे, पेट भरने से याद आया, हिन्दी फिल्मोमें शक्तिकपूर से पहले, आग़ा, धुमाल, मुकरी, केस्टॉमुखर्जी, महमूद, असरानी जैसे कई कॉमेडियन्स कई फिल्मों में, चड्डी पहनकर ही, दो पैसे कमाकर अपना पेट भरते थे..!!

इसी तरह, स्टेन्डअप कॉमेडी करके अपना पेट पालनेवाले कॉमेडियन राजु श्रीवात्सवजी, जब `बीगबोस सीज़न-३` में हिस्सा ले रहे थें तब, अपनी शरारती कॉमेडी के ज़रिए कई बड़े-बड़े सूरमाओं की चड्डी खींचनेवाले, राजु की खुद की चड्डी, इसी शॉ की चूलबूली प्रतियोगी कुमारी शमीता शेट्टी, अदिती और तनाझ बखत्यारने  मिलकर खींची थीं,जिस दृश्य को भारत सरकार के ईन्फरमेशन और ब्रॉडकास्टींग मिनिस्टरीने, पांच दिन की शोर्ट नोटिस भेजकर,  राजु की चड्डी खींचाई का  भद्दे  मजाकवाला दृश्य एडिट करवाया था ।


ऐसा ही एक किस्सा,`U.K. Big Brother` की आठवीं सिरीज़ के दौरान हुआ था । नोर्थ लंदन  के सुप्रसिद्ध मॉडल ,` Zachary Sami "Ziggy" Lichman` (जन्म- ५ फरवरी १९८१.) प्रतिस्पर्धि, बिग ब्रधर शॉ शुरु होने के बाद तीन दिन के पश्चात शॉ में दाखिल हुए थे और इस शॉ की कुछ नटखट कुँवारी (??) कन्या प्रतियोगीने मिलकर` झिग्गीभाई` की चड्डी सचमुच खींच ली थीं । इसका वीडियो आज भी ,` YOU TUBE` पर उपलब्ध है । इस शॉ के विजेता`,`Brian Belo` हुए थे ।


चाहे `मुन्नाभाई MBBS` हो या फिर`थ्री ईडियट`फिल्म के कॉलेज का रेगिंग दृश्य? ये चड्डी खींचाई का सब्जेक्ट, हर एक फिल्म डायरेक्टर के मन को, इतना भा गया है की ये सभी डायरेक्टर को हम कह सकते हैं,`जहाँपनाह तु सी ग्रेट हो..!!`


फिल्म,`थ्री ईडियट्स`में विकिलीक्स की पेटर्न पर, ऐसे ही भाषण के दस्तावेजमें `चमत्कार` शब्द की जगह `बलात्कार` शब्द बदली करके, ज़ुल्मी मेन्टोर सहस्त्रबुद्धे (बोमन ईरानी) की चड्डी सब स्टूडन्ट्सनें बराबर खींची है ।


वैसे यह समाचार एकदम ताज़ा है की, अभी-अभी गुजरात के सी.एम.श्रीनरेन्द्र मोदीजीने, अमेरिकन कॉन्स्यूलेट जनरल मि.माईकल ऑवन की चड्डी कुछ ऐसे खींच ली थी की, अब माइकल ऑवन की चड्डी आजकल कहाँ है ? उसका ऑक्सन होगा की नहीं? ये बात कोई नहीं जानता ।

दोस्तों, अंतिम समाचार प्राप्त होने तक, आधुनिक शॉरुम में, पर्याप्त चड्डी ईकठ्ठी हो जाने पर,थोड़े ही दिनों पहले, जूलियन असांजे ने, महान नेताओं की `चड्डीओं का ऑक्सन`(नीलामी) आयोजित किया था ।


अभी-अभी प्राप्त समाचार मुताबिक, जूलियन असांजे आयोजित, विश्व भर के नेताओं की `चड्डीओं के ऑक्सन`में असांजे को बहुत भारी मुनाफ़ा प्राप्त हुआ है ।


चड्डीओं की नीलामी के दौरान एक अनहोनी भी हो गई थीं ।


ऑक्सन-हॉल में, हॉल के ग़रीब चपरासी  की  फटीं चड्डी,  ग़लती से नीलामीमें  शामिल हो गई थी, जिसकी अच्छी-ख़ासी बोली लगने के बावजूद, वह ग़रीब चपरासीने जूलियन असांजे को, ये कहकर अपनी चड्डी बेचने से,  इनकार कर दिया की,


" हमारी चड्डी भले ही फटीं हुई है, मगर इसे मैंने अपने पसीने की कमाई से खरीदी है । ज्यादा फट जायेगी, तब  मेरी पत्नी इसे काट-छांट कर, मेरे छोटे बच्चे की चड्डी बना लेगी और मेरे बच्चे की चड्डी भी फट जायेगी तब, उसको घर के पोंछे के तौर पर इस्तेमाल करेगी । असांजे साहब, हम ग़रीब ज़रूर हैं पर, अपने फटे कपड़े और  बूढ़े  माता-पिता से, आखिरी सांस तक, न तो कभी शरमातें हैं, ना ही कभी उनको, किसी ओर के हवाले करते हैं ।"


हे  कुर्सी मैया, ऑक्सन (नीलामी) हॉल के यह ग़रीब चपरासी से, हमारे  सारे महान, प्रातःस्मरणीय, आदरणीय  नेता  क्या  कुछ शिक्षा  ग्रहण  करेंगे..!!

"मगर..हाय.. वो दिन कहाँ की मियाँ के पाँव में जुती..!!"

फिलहाल  तो, जूलियन असांजे  बड़ी  उलझनमें हैं  की,

"क्या ये यही देश है जहाँ, ताक़तवर,अमीर,सत्ताधारी नेता लोग भ्रष्टाचार के पैसों से खरीदी हुई, परदेश की अत्यंत महँगी चड्डी उतर जाने पर भी, अपने नंगेपन पर गर्व महसूस करते हैं और इससे बिलकुल विपरीत, इसी देशमें एक ग़रीब चपरासी अपने पसीने की कमाई से खरीदे  हुए,  फटें कपडों को, बूढ़े माता-पिता जितना ही प्यार करके, उसकी नीलामी करने से परहेज़ करता है? "


मेरे प्यारे, मिस्टर जूलियन असांजे साहब, यही तो है, मेरा महान भारत ।


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"ANY COMMENT?"


मार्कण्ड दवे । दिनांकः २७ -०३-२०११.

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