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Sunday, June 12, 2011

पापा, डरना मना है?

प्रिय पापा की परछाईं,
खुशहाली की अंगड़ाई ।


सौजन्य-गूगल
प्यारे दोस्तों,

अभी  मेरे हाथों में, एक `नवजात पिता` की निजी डायरी है । चलिए, उस पति महाशय को, `नवजात पापा` बनने के बाद कैसा महसूस हुआ और `नवजात पापा = नवजात पप्पू` पापा बनने की कसौटी में पास हुआ या नापास ये भी उन्हीं से जानने की कोशिश करते हैं..!! मैं आपको उनकी डायरी के कुछ पन्ने ही पढ़कर सुना देता हूँ, ठीक है?

नवजात संतान के नवजात पिता की डायरी से कुछ यादगार लम्हें..!!

"सांस-सांस बस,उमंग उर में झिलमिल है करता..!!
 नन्हा  सा कान्हा मेरा कैसे,खिलखिल है हँसता..!!


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पापा, ड़रना मना है?


किसी भी इन्सान के जीवन में सब से अधिक आनंददायक पल, उनके घर में, नन्हे बच्चे का जन्म हो, वही पल होती है । सारी दुनिया में, किसी के बाप की भी परवाह न करने वाले, बड़ी-बड़ी मूँछोवाले सुरमाओं की मूँछें खींचनेका अदम्य साहस, यह छोटा सा बच्चा कर सकता है..!!


आज से सात दिन पहले मेरे घर भी ऐसा ही एक आनंद का शुभ अवसर आया हुआ है, जी हाँ मैं एक बड़े प्यारे से लड़के का पापा बन गया हूँ..!!


अस्पताल में ही सभी को इस नवजात का कोई दूसरा नाम न मिल पाने की वजह से, सभी ने सर्वसम्मति से, अनायास ही,`नानका` नाम रख दिया और केवल सात दिन की आयु के,हमारे नानका साहब का आज सर्वप्रथम गृह प्रवेश हुआ है..!!


हालाँकि,अस्पताल से घर आते ही, `नानका` को देखने के लिए, घर के सारे सदस्य की भीड़ मेरी पत्नी और नानका के आसपास लिपटी रही जिसके कारण मैं, नानका का नवजात पापा उसे ध्यान से, मन भर देख न पाया ।


थोड़ी देर के बाद भीड़ कम होते ही, मैं जब पत्नी के पास गया तब, उसने नानका को मेरी गोद में रखते हुए, आनंद के साथ कहा," लीजिए आप का नन्हा सा कान्हा..!! और हाँ, इस घर में आज से आप का एकाधिकार शासन खत्म हुआ..!!"


यह सुनकर, मेरी गोद में हाथ-पैर उछाल रहे, नानका की ओर जब मैंने  देखा तब पता नहीं क्यों,मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि, वह मेरे चेहरे की ओर देखकर मेरी मूँछें ढ़ूँढ़ने का प्रयास कर रहा हो?  


आखिर,मूँछ ढ़ूँढ़ने में नाकाम होते ही, मानो मेरा उपहास कर रहा हो, ऐसा मुँह बना कर, नानका ने  बड़े जोरों से रोना शुरू कर दिया..!! मेरी गोद में नानका को सलामत मान कर, दूसरे कमरे में गई हुई, नानका की मम्मी (मेरी पत्नी) तुरंत भाग कर आ गई और नानका से पूछने लगी,"क्या हु..आ, मे..रे नानका को..ओ..ओ..!!"


फिर भी नानका का रोना बंद न हुआ तो, पत्नी ने मेरे सामने आशंका जताते हुए, नाराज़ स्वर में पूछा,"  क्या किया आपने, नानका के साथ?"


आज दिन तक जब से, मेरी पत्नी शादी करके आयी है,  अगर मैं `रात कहूँ तो रात और दिन कहूँ तो दिन` कहने वाली पत्नी का ,ऐसा हिम्मत पूर्ण, अजीबो ग़रीब, अनपेक्षित सवाल सुनकर, पहले तो मैं क्षुब्ध हो गया और बाद में कोई उत्तर न मिलने पर, ज़ुबान लड़खड़ाने के कारण, आखिर मैं बहुत डर गया..!!


हालाँकि, मेरे जवाब की अपेक्षा किए बिना ही, वो चलती बनी,पर आज ना जाने क्यूँ? मुझे ऐसा लग रहा है कि, आज मेरे ही घर में मेरी, `धोबी का कुत्ता ना घर का घाट का` जैसी हालत करने का, पूरा-पूरा मन बना कर, नानकाजी ने गृह प्रवेश किया लगता है..!!


अभी तक, घर के मुखिया के नाते, घर के सभी सदस्य पर धोंस जमा कर, मैं  आजतक  मनमानी करता रहा था, इस से उल्टा, यह घटना के बाद,  मारे डर के, ` ना निगल सकूँ,ना उगल सकूँ` जैसा कोई दर्द मेरे दिल में  घर कर गया..!!


आप को हँसी आ रही है?



पर इसके लिए, एक ही उदाहरण काफ़ी है, पहले तो लंच समय पर मेरी थाली में, गरमागरम रोटी,सब्जी,दाल-चावल,सलाड,अचार और रोज़ कुछ ना कुछ मीठा भी मिल जाता था, दोस्तों, ऐसी रसवंती थाली की जगह अब सुबह  का पका - बचा, बासी भोजन शाम को और शाम का पका-बचा भोजन दूसरे दिन दोपहर को खाने कि नौबत आ गई है..!!


`तारक मेहता का उल्टा चश्मा, के जेठालाल गड़ा कि माफिक, पूरा शर्ट ख़राब करते हुए, बड़े चाव से आम के रस के बड़े-बड़े कटोरे भर भर के पी कर, खाने के बाद, अपनी फूली हुई तोंद पर हाथ घूमाते-घूमाते, पूरा मोहल्ला सुने, इतनी ज़ोर से डकार लेने का मेरा सुख भी, यही नानका महाशय की वजह से अब छिन गया है । ये सारे सुखमयी डकार, मानो मेरी तोंद के भीतर ही हमेशा के लिए कहीं गुम हो गये हैं..!!


हालाँकि, आज एकबार ग़लती से, ज़ोर से डकार लेने का ऐसा सुख मैंने भोग लिया तो, रसोई में  बर्तन धो रही, नौकरानी ने मुझे बूरी तरह ड़ांट दिया," सा`ब`, ज़रा धीरे से..नानका डर जायेगा..!!" 


उस डेढ़ सयानी नौकरानी पर गुस्सा तो मुझे बहुत आया, पर `काबे अर्जुन  लूटियो वो ही धनुष वो ही बाण` को याद कर के,इतने बड़े घोर अपमान को मैं  अशेष  रूप में  निगल गया..!!


उसके पश्चात तो, अभी तक पूरे घर में, अल मस्त, पागल हुए, किसी जंगली बिल्ले की भाँति, इधर-उधर कहीं भी मुक्त मन से घूमने वाला मैं एक,`नवजात पापा` बिलकुल `मियाँ की भीगी बिल्ली` के माफिक  डरते-डरते, दबे  पाँव  घूमने लगा हूँ..!! दुख तो इस बात का है कि, घर में सभी का ध्यान, मेरी ओर से हट कर,उस नानका की ओर लगने की वजह से, घर में मेरी पीड़ा सुनने वाला भी अब कोई नहीं है ।


मेरे प्यारे दोस्तों,


आज याद आया कि, नानका का, गृह प्रवेश हुए  ढाई माह बीत चुका है और आजकल घर में मेरी हालत अत्यंत दया जनक हो गई है । इन दो ढाई माह  में,मुझे लगता है, बड़ा हो कर नानका, अपने पापा से शायद डरे ना डरे, इस वक़्त तो पापा (मैं) नानका से बहुत  डरने लगे हैं..!!


हाँ साहब, इस बात की एक ठोस वजह भी है, अभी थोड़े दिन से मुझे भयंकर सर्दी-ज़ुकाम हुआ है और आज सवेरे, ग़लती से मैंने, पूरे घर की नींव कांप उठे, इतने बड़े ज़ोर से छींक दिया, जिसकी आवाज़ से नानका बहुत डर गया फिर इतने ज़ोर से रोने लगा कि, वह सिसकीयाँ भर कर रोने लगा ।


बस, हो गया मेरा कल्याण..!!


मेरे छींकने की आवाज़ से, नानका को रोता हुआ देख कर, घर के सारे सदस्य, मेरे सामने बिना कुछ कहे, अपनी नाराज़गी जताते हुए, नानका को शांत करने के प्रयास में लग गए..!!


मेरी पत्नी की नाराज़गी तो यहाँ तक बढ़ गई कि, उसने हमारे घर का मुख्य दरवाज़ा दिखाते हुए, मुझ से ये तक कह दिया कि," आइन्दा, अब अगर आपका छींकने का मन करे तो आप घर के बाहर बरामदे में जा कर छींकना,घर में मत छींकना?"


अ...रे...रे..!! एक वक़्त ऐसा भी था कि, इस मर्द महा मानव का (मेरा), धंधे से लौटते ही, फ्रिज़ के ठंडे पानी और गर्मागर्म ताज़ा चाय-नाश्ते से,जिस घर में स्वागत होता था, उसे आज छींकने जैसी फ़ालतू प्रवृत्ति करने के लिए, अपने ही घर का दरवाज़ा दिखाया जा रहा है?


आप ही बताइए ना, क्या छींक मेरी कोई रिश्तेदार लगती है कि, मेरी इजाज़त लेकर नाक से बाहर निकलेगी? और फिर, प्रत्येक पल, सिर्फ छींकने के लिए, घर के बाहर गली तक भागना भी क्या अच्छा दिखेगा? मेरे बारे में, गली के लोग क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे?


पत्नी ने दरवाज़ा दिखाया ये बात मुझे तो बहुत बुरी लगी..!!


इस अपमान से, मेरे दिल में कुछ ऐसे भाव उठने लगे कि, " चलों जीव..!! अब इस घर में मेरा स्थान ख़तरे में है और  जब तक ये सर्दी मैया, मेरी नासिका से प्रस्थान कर के, किसी और महा मानव की नासिका में न घुसे, तब तक कुछ दिन के लिए, किसी मंदिर की धर्मशाला में रहने के लिए चले जाना चाहिए क्योंकि, जब तक सांस लेता रहूँगा,छींक तो आने वाली ही है तो क्या मुझे सांस लेना भी बंद कर देना चाहिए..!!


यही सोचते-सोचते, सर्दी की दवाई के नशे के कारण, मेरी आँख लग गई और नींद में मुझे एक अजीबोगरीब ख़्वाब आने लगा..!!


ख़्वाब में मैंने देखा कि, सन-१९७७ में रिलीज़ हिन्दी फिल्म `यही है ज़िंदगी` में, श्रीसंजीवकुमारजी को मिलने के लिए, साक्षात भगवान श्रीकृष्णजी आयें थे, इसी प्रकार मुझ से मिलने के लिए, मंद-मंद मुस्कुराता हुआ कान्हा मेरे सामने खड़ा है..!!

पर ये क्या..!! भगवान श्री कृष्ण का चेहरा हूबहू मेरे नानका जैसा ही तो है..!!

भगवान कान्हा से मैं कुछ कहता इससे पहले ही, कान्हा मुझ से कहने लगा," बस..!!  इतना जल्दी मुझ से थक गया? क्या बिना रो ये ही, तुम इतने बड़े हो गए हो? मुझ से इतना डर गए हो कि, तुम घर से पलायन करना चाहते हो, तुम ये क्यों नही समझते कि, तुम सब को  मिलने के लिए ही तो मैं ने , साक्षात ईश्वर ने, तेरे घर में जन्म लिया है..!!

इतना सुनते ही, मैं बहुत भावुक हो गया और मेरी आँख से आंसु बहने लगे । मेरी आँख से आंसु बहते देख कर, कान्हा ने अपने छोटा सा हाथ आगे बढ़ाया और अपनी नन्हीं-नन्हीं सी ऊँगलियों से, हल्के से, मेरे आंसु पोंछे..!!

भगवान कान्हा का स्पर्श होते ही, मेरा सारा दर्द न जाने कहाँ ग़ायब हो गया और साथ में मेरा ख़ाब भी टूट गया ।  अब मैंने  देखा कि, बिलकुल  मेरी बगल  में, नानका को सुलाकर, उसकी मम्मा सामने खड़ी है, नानका के हाथ मेरे गाल पर है और मुझे देख़ कर, वह हूबहू भगवान श्री बाल कान्हा कि माफिक मेरे सामने, अपनी चिरपरिचित मंद-मंद मुस्कान बिखेर रहा है..!!

नानका को मेरे सामने मुस्कुराते देख कर,  उसकी मम्मा ने नानका को झूठमुठ  ड़ांटते हुए कहा," सारा दिन तेरी एक मीठी सी मुस्कान देखने के लिए हम सब तरस जाते हैं और, तेरी मधुर मुस्कान का सारा ख़ज़ाना, अपने पापा पर लूटाता है, बद..मा..श..!!"

इतना कह कर, घर के बाकी सदस्य को भी, नानका की मधुर मुस्कान दिखाने के लिए,  नानका की मम्मा ने, सभी को बड़े ज़ोर से आवाज़ लगाई..!!

यह देख कर मैंने पत्नी को ड़ांटा," ज़रा धीरे-धीरे..!! नानका डर जायेगा..!!"

हालाँकि, अब मैं इतना आश्वासन ज़रूर ले सकता हूँ कि, " सर्दी मैया की अब, ऐसी की वैसी, छट्..!!

हमें तो लगता है, जिस रोज़, किसी नानका के मम्मा-पापा से लेकर घर का अन्य कोई भी सदस्य, साक्षात भगवान श्री कृष्ण समान अपने-अपने नानकाओं से थक-हार कर उनसे दूर भागने लगेंगे उस दिन, पूरी धरती अनंत में लुप्त हो जाएगी?

दोस्तों, आज `विश्व फाधर्स डॅ` का शुभ अवसर है और आज ईश्वर से  मैं  यह प्रार्थना कर रहा हूँ कि, आपका घर ऐसे ही छोटे-छोटे नानकाओं की, खिलखिलाहट भरी हँसी से सदैव गूंजता रहे..!!

॥ पितृ देवो भवः ॥

एक नवजात पापा का नमस्कार ।

मार्कण्ड दवे । दिनांक- १२-०६-२०११.

Monday, May 9, 2011

घर मंदिर । (नीति कथा)

घर मंदिर । (नीति कथा) 
(सौजन्य-गूगल)
    
"विश्वास अगर जीत पाए श्रद्धा को,
  ईश्वर    भी   बाअदब   झुकता  है, 

  भक्त   से    गले     मिलने   को..!!"

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प्यारे दोस्तों,


आपके जीवन में कभी न कभी तो ऐसा अनुभव ज़रूर हुआ होगा कि, आप कभी अपनी सही राह भट़क कर, जीवन में चारों ओर से असहायता और हताशा महसूस कर रहे हों, इतने में ही कहींसे, आपकी कल्पना से परे, कोई अदृश्य, रहस्मयी, अलौकिक ईश्वरीय मदद आपको मिले और आपकी समस्या का समाधान चुटकीयों  में होते ही, आपकी  इज़्ज़त-आबरू सँभल जाएं?

ऐसे में स्वाभाविक है कि, आप के मन से चिंता का भारी पहाड़ तुरंत हट जाए..!!

हालाँकि, ये बात अलग है कि, कई लोग ऐसी अदृश्य,रहस्यमयी, अलौकिक ईश्वरीय मदद को जीवन का आकस्मिक घटनाक्रम मान कर, इसका सही आकलन करने से परहेज करते हैं? 

अगर हर एक के जीवन में घटती रहती ऐसी घटनाओं का सही तरीके से, हर बार पोस्टमार्टम किया जाए तो, कुछ समय पश्चात ऐसी अदृश्य,रहस्यमयी,अलौकिक ईश्वरीय शक्ति पर श्रद्धा बढ़ने के कारण, ईश्वर पर विश्वास दृढ़ होता है और ऐसे अनुभव बार बार होने पर, इन्सान के जीवन से मानसिक तनाव का नामोनिशान मिट जाता  है ।

 ऐसा ही एक वाक़या मेरी उपस्थिति में,सन-१९५९ में(५२ साल पहले) घटा था । आज मैं  उसी घटना का बयान कर रहा हूँ, जिसके कारण, जीवन के प्रति देखने का, मेरा समूचा नज़रिया ही, सकारात्मक भाव जगत में बदल गया ।


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God's Palace


घर मंदिर- भगवान का महल ।


" मनजीभाई,आप मंदिर का काम शुरू कर दीजिए, घर मंदिर का काम पूरा होने पर, मैं आपको पूरा मेहनताना चुकाऊंगा तो चलेगा ना? ये रहा घर मंदिर का नक़्शा ।" 

ईश्वर पर पूर्ण श्रद्धा रखने वाले और सरकारी पाठशाला में बरसों तक, प्रामाणिकता और पूर्ण निष्ठा के साथ, छात्र एवं अभिभावकों की सेवा करके, अभी अभी निवृत्त हुए, आचार्य श्रीकेशवजी ने, पत्थर पर नक़्क़ाशी काम करने वाले,  नक़्क़ाशीदार-कलाकार श्रीमनजीभाई को, प्रेम से गुज़ारिश की ।

"अरे..!! ये क्या कहा आपने मास्टर साहब? आपके पैसे मानो बैंक में ही पड़े हैं, मैं आपके नक्शे के मुताबिक घर मंदिर तैयार कर दूँगा और आपको मेरा काम पसंद आए तो ही, आप मुझे पैसा देना, वर्ना मुझे एक भी रुपया नहीं चाहिए ।" इतना कह कर, कलाकार मनजीभाई जल-पान करके,`जयश्री कृष्ण` कह कर,दूसरे दिन से काम शुरू करने का वादा करके,  वहाँ से विदा हुए ।

सच्चे हृदय से छलकते प्रेम और ईश्वर के प्रति अनन्य श्रद्धा को मन में संजो कर, दूसरे ही दिन से, छोटे-लंबे पत्थर, लोहे के पतले गर्डर और अपनी कला के सारे औज़ार के साथ, बेनमून कलाकार श्रीमनजी मिस्त्री ने अपनी कला के जौहर दिखाना शुरू कर दिया । बारीक़ खुदाई से शोभित छोटे छोटे पतले स्तम्भ, कलात्मक चाप (Arch), अर्ध गोलाई वाला शिखर का कच्चा नमुना तैयार हुआ तभी, देखने वाले सभी के हृदय "शाबाश कलाकार शाबाश` कहने लगे..!!


पंद्रह दिन में ही,आचार्य साहब के घर के अंदर, पूर्व दिशा में, एक दीवार पर, घर मंदिर के  तैयार किए गए सारे हिस्सों को,कलाकार मनजीभाई ने,जब एक दूसरे से जोड़े, तब घर मंदिर का कार्य संपूर्ण न होते हुए भी, मंदिर बहुत सुंदर लग रहा था ।


घर मंदिर के ढांचे को निहार कर, आचार्य केशवजी ने  अत्यंत प्रसन्न होकर, कलाकार मनजी मिस्त्री की पीठ थपथपाकर, उन्हें शाबाशी देते हुए कहा भी कि," वाह, मनजीभाई, आखिर भगवान का महल तैयार हो ही गया और ये तो किसी राजा के महल से भी सुंदर लग रहा है..!! आप की ऊँगलियों में क्या जादू है?"

और पंद्रह दिन बीत गए, मंदिर का परिष्करण कार्य चलता रहा । भगवान बाल ठाकुरजी के लिए मार्बल का छोटा सिंहासन, पानी की छोटी सी झारी(kettle-like vessel) के लिए अलग जगह, पूजा थाल-आरती- दीपक इत्यादि के लिए सुविधा वगैरह..वगैरह..!!

आखिर करीब एक माह की कड़ी  मेहनत के बाद, आज भगवान का घर मंदिर..ओह..सॉरी..भगवान के महल का निर्माण कार्य संपन्न हो ही गया..!! बिजली के, १०० वॉट के बल्ब से चमकता प्रकाश, घर मंदिर में फैल गया । इसी के साथ, उत्कृष्ट कलाकार मनजीभाई की नज़र में, अपना कार्य सच्चे मन से करने के संतोष की, तेज़ चमक भी फैल गई ।

घर मंदिर का पारिश्रमिक दो दिन बाद लेने के लिए आने को कह कर, मनजीभाई ने, आचार्य साहब से  विदा ली, तब  श्रीकेशवजी के परिवार के उपस्थित सारे सदस्यों को, इस बात से बड़ी हैरानी हुई कि, केशवजी मास्टर साहब ने, मनजीभाई मिस्त्री से, उनके पारिश्रमिक की रकम के बारे में न कोई बात की, ना मनजीभाई ने अपने मेहनताने की रकम का कोई खुलासा किया..!!


आज सुबह से मास्टर साहब की धर्म पत्नी चिंतामग्न थीं । आज घर मंदिर निर्माण का मेहनताना (बील) लेने के लिए मनजीभाई मिस्त्री आने वाले थे और घर में सिर्फ दो रूपये ही पड़े थे ।(ये सन-१९५९ की बात है ।) मेहनताना चुकाने की जितनी चिंता आचार्यजी की पत्नी को थी उससे बिलकुल विपरीत, फ़क़ीर जैसे स्वभाव वाले मास्टर साहब, बगैर कोई चिंता के, भगवान बाल ठाकुर को, उनके महल में, श्रद्धापूर्वक, धूमधाम से प्रवेश कराने की तैयारी में पड़े थे ।


मास्टरजी की पत्नी की चिंता भी बिलकुल समुचित थी । निवृत्ति वय होने के कारण, अभी अभी रिटायर्ड हुए आचार्य केशवजी मास्टर को, अपना पेंशन हक़ पाने के लिए, सरकारी कचहरी के चक्कर काटने शुरू हो गए थे ।

वैसे तो, उन कचहरी में,केशवजी मास्टर के हाथों, प्रामाणिकता और कर्तव्यनिष्ठा की शिक्षा पा चुके कई छात्र नौकरी कर रहे थे, फिर भी अपने ही प्रातःस्मरणीय गुरूजी की पेंशन की फाइल मंज़ूर करने के लिए, गुरूजी के  उन आज्ञांकित शिष्यों  को, `शिष्यदक्षिणा` के रूप में, शायद कुछ रिश्वत की आशा होगी?

अब ऐसे सरकारी तुमारशाही में मास्टरजी का पेंशन शुरू होने में कितने साल लगेंगे, ये बात तो सिर्फ ईश्वर ही जानता होगा..!!

हालाँकि, ईश्वर तो सब कुछ जानता ही था, इसीलिए सुबह ११.०० बजे जब, कुशल कलाकार मिस्त्री मनजीभाई, अपने अस्पष्ट अक्षर में लिखा हुआ, मेहनताना का बील ले कर आ पहुँचे और मास्टर केशवजी के हाथ में रख दिया तब  केशवजी मास्टर साहब ने, वह मुड़े हुए कागज़ को खोले बिना या उसमें लिखी रकम को देखे बिना, घर मंदिर में बिराजमान भगवान बाल ठाकुर के चरणों में, बील का कागज़ रख दिया और  पत्नी को मनजीभाई के लिए चाय पानी का बंदोबस्त करने के लिए आवाज़ दी ।

मास्टर साहब की पत्नी ने चाय को चूल्हे पर उबालने के लिए रखी पर, उनको लगा मानो चाय के साथ साथ, बील की रकम जुटाने की चिंता में, उनका खून भी उबल रहा था..!!

चिंताग्रस्त दशा में, मास्टर साहब की पत्नी, मनजीभाई के लिए, जब चाय लेकर रसोई घर से बाहर निकलीं, तब आंगन में डाक वाला राधेश्याम खड़ा था और केशवजी राधेश्याम के पास से, आठ साल पहले किए हुए किसी सरकारी काम के मेहनताने की बाकी रकम के, आज भेजे गए, कुल १२० रूपये का मनीओर्डर छुड़वा रहे थे ।

मास्टरजी ने, डाक वाले राधेश्याम से रूपये १२० लेकर सीधा, मनजीभाई की हथेली पर रख दिया ।

मनजीभाई ने आश्चर्य से मास्टर साहब की ओर देखा और बाद में इतना ही कह पाए कि,

" मेरा बील तो आपने बग़ैर पढ़े ही भगवान के सामने रख दिया था, फिर आपको कैसे पता चला कि, मेरा मेहनताना १२० रुपया हुआ है?

भगवान पर असीम श्रद्धा के कारण, मंद मंद मुस्काते हुए केशवजीने, मनजीभाई को उत्तर दिया,

" मुझे आपके बील की रकम जानने की क्या जरूरत है? जिस भगवान  का आपने महल बनाया है, उसे तो सब कुछ पता है ना?" फिर पत्नी की ओर देख कर केशवजी बोले," अरे..!! राधेश्याम के लिए भी चाय तो ले आना ज़रा?"

ये सुनकर, मनजीभाई मिस्त्रीने ही अपनी चाय में से, आग्रह करके आधा कप चाय, डाक वाले राधेश्याम के हाथ में थमा दी ।

मास्टर साहब की धर्मिष्ठ पत्नी, अब  सारी चिंता त्याग कर ईश्वर की अनहद कृपा भाव का आनंद उठाने लगीं और उन्हें  महसूस हुआ, मानो डाक वाले राधेश्याम के रूप में, स्वयं मुरली मनोहर मनमोहन बाल श्री कृष्ण, सुदामा स्वरूप, मास्टर केशवजी की मदद के लिए आ पहुँचा है और चाय के रूप में, तांदुल स्वीकार कर रहा है..!!

मनजीभाई मिस्त्री के हाथों जब, डाकिये राधेश्याम ने आधी चाय स्वीकार की तब, मनजी मिस्त्री को भी ऐसा लगा जैसे, भगवान का महल निर्माण करने की खुशी में,साक्षात बाल कृष्ण, डाकिये राधेश्याम का रूप धर कर  उनके हाथों से चाय पी कर, उनके प्रति आभार प्रकट करने आ पहुँचे हो..!!

दोस्तों, ये सारी अलौकिक घटना को, कोई नास्तिक या तर्कवादी इन्सान, आकस्मिक मान कर उसे अनदेखी कर सकता हैं, परंतु आप भी अपने जीवन में मुसीबत के वक़्त आपके हित की या अहित की, किसी भी घटना को निष्पक्ष भाव से निहारें और मूल्यांकन करने की आदत डालें, तो एक दिन ऐसा आएगा कि, आपको अपनी सफलता पर ना तो अभिमान  होगा और नाकामी पर आपको ना ही दुःख या चिंता सताएगी..!!

ईश्वर के प्रति पूर्ण शरणागति..यही तो है आनंदमय जीवन का रहस्य..!!

 "सर्व धर्मान् परितज्य मामेकम् शरण्म् व्रजः॥"

आइए, आज से हम भी, अपने जीवन में हर क्षण घटने वाली प्रिय-अप्रिय, किसी भी घटना का तटस्थ भाव से मूल्यांकन करना शुरू कर दें, इस आशा में कि,  हमें कृतार्थ करने और हमारे हाथों से भी आधी चाय पीने, शायद कभी न कभी, कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में, स्वयं नारायण आ जाए..!!

अस्तु,

मार्कण्ड दवे । दिनांक-०८-०५-२०११.

Sunday, March 20, 2011

श्री मोबाईल नारायण व्रत कथा ।

श्री मोबाईल नारायण व्रत कथा ।


(courtesy-Google images)


॥ श्री नारद उवाच ॥

" मर्त्यलोके जनाः सर्वे नाना क्लेश समन्विताः ।
  नाना योनि समुत्पन्नाः पच्यन्ते पाप कर्मभिः॥११॥"


" हे प्रभो, मनुष्य लोक में सभी मानव विविध योनि में उत्पन्न हो कर, नाना प्रकार के दुखों से लिप्त हो कर, अपने पाप कर्मों से पीड़ित है । उनके यह दुःख कौन से नाना उपाय द्वारा शांत हो सकते हैं? मुझे कृपया बताएं, मैं वह सब श्रवण करना चाहता हूँ । "

॥ श्री भगवान उवाच ॥

" साधु पृष्टं त्वया वत्स लोकानुग्रहकांक्षाया ।
संत्कृत्वा मुच्यते मोहात तच्छृणुष्व वदामि ते ॥१३॥"


" हे वत्स, मनुष्य के हित की इच्छा से आपने मुझे सही बात जानना चाही है; जिसको करने से मनुष्य मोहमाया से मुक्त होता है,बह मैं आप को बताता हूँ सुनें ।"

(प्रथमोध्याय -श्रीसत्यनाराणय व्रत कथा)

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हे प्रिय वत्स, (दोस्त)

आज के घोर कलयुग में, संसार के सारे दुखों से मुक्ति दिलानेवाली, श्री मोबाईल नारायण व्रत कथा ही है । यह कथा को विधि पूर्वक करने से मनुष्य तत्काल  पृथ्वी लोक पर सर्वे सुख भोग कर, तमाम दुःख से आजीवन मोक्ष प्राप्त करता है । आज मैं भी, आपको यह व्रत कथा सुनाता हूँ वह आप सर्वे इसे  ध्यान से श्रवण करें ।

श्री मोबाईल नारायण प्रित कथा;अध्याय-प्रथम ।

आज होली-धूलेटी के इस पावन महा पर्व के दिन, संसार का कोई भी मानव पूर्ण श्रद्धा एवं प्रितीभाव मन में धारण कर, भगवान श्री मोबाईल नारायण की (खरीददारी) पूजा कर सकता है । कलयुग में, इस मनुष्य लोक में, अनेक दुखों से मुक्ति पाने के लिए, यह सबसे सरल और श्रेष्ठ उपाय है ।

ईतिश्री सेटेलाईट पुराने रेवा खंडे श्री मोबाईल नारायण कथायां प्रथमोડध्यायः संपूर्ण ।

बोले, श्री मोबाईल नारायण भगवान की....ई..ई..जय..अ.अ,,!!

( सभी भक्त गण अपने-अपने लोटे (पात्र) के उपर अपना चम्मच टकराएं, अगर पास लोटा या चम्मच न हो तो, अपने मोबाईल में कोई `शीला की जवानी` का रिंग टोन बजाएं ।

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श्री मोबाईल नारायण प्रित कथा अध्याय-द्वितीय ।

निर्धन प्रेमोच्छुक कॉलेजियन प्रेमी और एक मासूम, सुंदर  कन्या को प्राप्त हुए पून्य फल की कथा ।

॥ लेखक उवाच ॥

हे वत्स, संसार में, जिसने श्री मोबाईल नारायण  का व्रत सब से पहले किया था वह कथा मैं आपको सुना रहा हूँ ।

भारत की पून्य भूमि पर एक निर्धन कोलेजियन प्रेमी युवक, धरती पर  एक मासूम कन्या के विरह में सुधबुध खो कर, भ्रमित हो कर, इधर-उधर की ख़ाक छान रहा था । उसे इस तरह अत्यंत दुःखी  पाकर, भगवान श्री कामदेवजी ने अत्यंत प्यारभरे स्वर में, उस प्रेमी से प्रश्न किया," हे प्रेमीओं की जाति में श्रेष्ठ । आप अत्यंत दुःखी क्यों है? यह मैं जानना चाहता हूँ इसलिए मुझे विस्तार से बताइए ।"

॥ प्रेमी उवाच ॥

" हे श्री कामदेव प्रभु, मेरे साथ कॉलेज में पढ़ती हुई एक मासूम सुंदर कन्या के विरह से पीड़ित ऐसा में एक प्रेमी हूँ । अगर आप मेरा यह दुःख दूर करने योग्य कोई सरल उपाय जानते हैं तो कृपा करके मुझे बताएँ।

प्रेमी युवक की आर्द्रतापूर्ण वाणी से द्रवित होकर, श्री कामदेव जी ने अपने चिर परिचित मंद-मंद मुस्कान बिखेरते  हुए  अंदाज़ में, यह प्रेमी को भगवान श्री मोबाईल नारायण नामक देव की मूर्ति को अपने हाथों से अर्पण किया । यह नवयुवक को भगवान श्री कामदेवजी ने बताया की, अभी-अभी थोडी देर पहले ही, वही मासूम सुंदर कन्या को भी, भगवान श्री मोबाईल नारायण की ऐसी ही एक प्रतिकृति उन्होंने अर्पण की है । इतना कहकर भगवान श्री कामदेव जीने उस मासूम सुंदर कन्या के श्री मोबाईल नारायण से संपर्क करने के सारे विधि-विधान से, विरही प्रेमी को अवगत कराया और अनंत-असीम प्रेम का अहसास कराने विरही प्रेमी के शरीर में प्रवेश कर, अंतर्ध्यान हो गये ।

" श्री कामदेव भगवान ने, भगवान श्री मोबाईल नारायण का जो व्रत करने के लिए, मुझे विधि समझाया है, वह मैं श्रद्धा पूर्वक ज़रूर करुंगा ।" यह सोचते हुए, विरही कॉलेजियन प्रेमी को सारी रात नींद भी  न  आ पाई ।

दूसरे दिन, प्रातःकाल में, जाग कर नवयुवक ने," आज मैं श्री मोबाईल नारायण का व्रत ज़रूर रखूंगा ।" मन में ऐसा संकल्प धर कर भगवान श्री कामदेवजी का सच्चे हृदय से स्मरण करके, विधि विधान अनुसार अपने श्री मोबाईल नारायण से, वह मासूम सुंदर कॉलेज कन्या के श्री मोबाईल नारायण से संपर्क किया ।

भगवान श्रीकामदेवजी के दर्शाए विधि विधान को सफलतापूर्वक ढंग से करने के कारण, व्रत के विधि अनुसार, व्रत पूर्णता के बाद, दो घंटे पश्चात, कॉलेज के पास की एक महंगी रेस्त्रां में दोनों प्रेमी पंखी  आमने सामने, व्रत कथा का `महा-प्रसाद` ग्रहण करने  हेतु, मॅक्सिकन-थाई फूड का ऑर्डर देकर साथ-साथ बैठे हुए थे ।

( " बोले, श्री मो..बा..ई..!!," अरे भाई साहब, ठहरिए, ज़रा ठहरिए.....अभी देर है ।  ज्यादा जोश  दिखाएँगे तो श्री मोबाईल नारायण रूठ जायेंगे ..!!)

श्री मोबाईल नारायण की इस पवित्र व्रत कथा अनुसार, वह निर्धन (कड़का-लुख्खा ) प्रेमी के पास, अपने से भी ज्यादा महँगा और स्टाईलिश श्री मोबाईल नारायण को देखकर, उस मासूम सुंदर कॉलेज कन्या ने, विरह में तड़पते हुए उस सच्चे प्रेमी युवक को, हर रोज़ के तिरस्कार भाव से विपरित, बहुत ज्यादा प्रेम-भाव व्यक्त किया ।  कालक्रम के बदलते ही, वह प्रेमी नवयुवक ने विरह के दुःख से मुक्त हो कर अपने मनवांच्छित प्यार को पा लिया ।

भगवान श्री कामदेव जी द्वारा बताए गए यह व्रत को  इस के पश्चात उन दोनों प्रेमीओं ने, प्रति माह श्री मोबाईल नारायण की नई प्रतिकृति खरीद कर, श्री मोबाईल नारायण का व्रत विधि पूर्वक बार-बार, प्रति माह कर के, वह मासूम कन्या और नवयुवक ने, प्रति मास अलग-अलग नया प्रेमी और प्रेमिका को पा कर अंत में इन्होंने संसार के सर्वे सुख को(?) ( ग़लत मत सोचें..!!) प्राप्त किया ।

भगवान श्री मोबाईल नारायण के इस पावन व्रत को, प्रति मास विधि पूर्वक करने फलस्वरूप, अपने निर्धन मित्र को अचानक नयी बार-बार नवीन प्रेमिका और नये प्रेमी के साथ कॉलेज में प्रसन्न होते देखकर, समग्र (HE-SHE) मित्र गणने भी यह पावन व्रत करने का मन में निर्धार किया और सभी यह पृथ्वी लोक में नाना प्रकार के प्रेम नामक मनवांच्छित सुख के अधिकारी बने ।

ईतिश्री सेटेलाईटपुराणे रेवाखंडे श्रीमोबाईलपारायण कथायां द्वितियोध्यायः संपूर्ण।

(ए..भाईसाहब..!! ए..सुनिए..ना; अब आप ज़ोर से बोल सकते हैं..!!)

बोले, श्री मोबाईल नारायण भगवान की....ई..ई..जय..अ.अ,,!!

( सभी भक्त गण अपने-अपने लोटे (पात्र) के उपर अपना चम्मच टकराएं, अगर पास लोटा या चम्मच न हो तो, अपने मोबाईल में कोई `मुन्नी बदनाम हुई` का रिंग टोन बजाएं ।)

 हे परम सुखी प्रेमी जन, यह पावन कथा में किए गये वर्णन  अनुसार, प्रति मास, पुराने श्री मोबाईल नारायण की, मोह माया से मुक्त होने हेतु, कथा पूर्ण होने के पश्चात व्रत कथा का महा-प्रसाद ग्रहण करना अति आवश्यक  है । ऐसा न करने से, भगवान श्री मोबाईल नारायण दुःखी होकर रूठ जाते हैं तथा बार-बार नेटवर्क की समस्या खड़ी करने लगते हैं ।

आज की इस पावन कथा में, उन सभी मासूम सुंदर कन्याओं के, पहलवान, कुस्तीबाज, पिता-मामा-चाचा- भाई यहाँ अभी-अभी उपस्थित हुए हैं । यह कथा समापन का महा-प्रसाद (ही..ही..ही..!!) वितरण विधि उन्हीं के कर कमल से संपन्न होना है, कृपया आप कहीं मत जाईएगा, कुछ समजे..ए..ए..ए.ए..!!

मासूम सुंदर कन्याओं के, पहलवान, कुस्तीबाज, पिता-मामा-चाचा- भाई के करकमलों से प्राप्त महा-प्रसाद आपको ज्यादा गर्म लगता हो तो, ग़म गलत करने के लिए, सॉरी मुँह की जलन-गर्मी गलत करने के लिए, रास्ते में कहीं अपना बाईक खड़ा रखकर, आप फटाफट ठंडाई या भांग पी सकते हैं ।

बोले, श्री मोबाईल नारायण भगवान की....ई..ई..जय..अ.अ,,!!

( सभी भक्त गण अपने-अपने लोटे (पात्र) के उपर अपना चम्मच टकराएं, अगर पास लोटा या चम्मच न हो तो, अपने मोबाईल में कोई `हूड दबंग-दबंग-हुड-हुड-हूड, दबंग-दबंग-दबंग` का रिंग टोन बजाएं ।

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प्यारे युवा प्रेमी दोस्तों, वैसे तो, यह व्रत कथा, सब को अपनी-अपनी क्षमता अनुसार, महा प्रसाद प्राप्ति के बाद पूर्ण होनी है । सिर्फ भगवान श्री कामदेवजी की `आरती` करना ही बाकी है, सभी भक्त अपने-अपने जूते-बूट-चप्पल, दोनों हाथों में ग्रहण करें और रोनी सी  सूरत बना कर, ऊँचे सुर में, ज़ोर से  चिल्लाती हुई आवाज़ में, `जय कामदेव-जय कामदेव`` आरती में कृपया हमें साथ दें ।

श्री मोबाईल नारायण व्रत कथा आरती..!!

" समरुं रिलायंस, टाटा, प्रेमे  डो..को..मा (२)

  मनवांच्छित,वर देते,सब को मोबाईल देवा.

जय..कामदेव..!!

१. सुंदर-स्लीम स्वरूप, मन मोहक देवा..(२)

 सत्य-असत्य कथनसे, होती तम सेवा.

जय..कामदेव..!!

२. उल्का मुख गीरता, प्रेमी जन देवा (२)

नित नये कर सोहे, भजते हैं काम देवा.

जय..कामदेव..!!

(अस्तु, अस्तु, अस्तु, भगवान श्री मोबाईल नारायण की स्तुतिमें श्रीकामदेवजी की ये आरती के आगे के बाकी सारे अंतरे आप विद्वान पाठक मित्र खुद ही लिख लेना । मेरा कंठ-आकंठ दर्द से भर जाने की वजह से, क्षमा करना,  अब आगे मैं  गा नही पाउंगा ।)

मार्कण्ड दवे । दिनांक; २० -२ -२०११.

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